कलकत्ता हाईकोर्टने शुक्रवार को एक अहम आदेश में मनरेगा (MGNREGS) से जुड़े कथित फर्जीवाड़े के मामले में तकनीकी अधिकारी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि केवल पद पर तैनाती के आधार पर किसी को आपराधिक साजिश का हिस्सा नहीं माना जा सकता, जब तक उसके खिलाफ ठोस दस्तावेजी प्रमाण न हों।
मामला क्या था?
यह मामला मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर ब्लॉक-II से जुड़ा है। वर्ष 2017 में ब्लॉक विकास अधिकारी (BDO) की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई थी। आरोप था कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) के तहत पांच बागवानी और भूमि विकास परियोजनाएं कागजों पर पूरी दिखाकर सरकारी धन निकाल लिया गया।
Read also:- 17 साल की लड़की ने माता-पिता संग जाने से किया इनकार, गुजरात हाईकोर्ट ने चिल्ड्रन होम भेजने का दिया आदेश
प्रारंभिक जांच में “घोस्ट वर्क” यानी कागजों पर काम दिखाने का पैटर्न सामने आया। अभियोजन के अनुसार ग्राम प्रधान, ग्राम रोजगार सेवक और अन्य अधिकारियों की मिलीभगत से यह धन निकाला गया।
याचिकाकर्ता अरको दीप साहा उस समय “स्किल्ड टेक्निकल पर्सन” (STP) के रूप में सीमित अवधि के लिए कार्यरत थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि उनकी “तकनीकी चुप्पी” ने घोटाले को संभव बनाया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में जोर देकर कहा कि जिन परियोजनाओं में गड़बड़ी बताई गई, वे 2015 में स्वीकृत और वित्तपोषित हो चुकी थीं, जबकि उनके मुवक्किल ने 2016 के अंत में पद संभाला।
Read also:- दादा-दादी 'फैमिली' में नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्टांप ड्यूटी में छूट नहीं मिलेगी
अदालत को बताया गया कि न तो उनके हस्ताक्षर माप पुस्तिका (Measurement Book) पर हैं और न ही किसी पूर्णता प्रमाणपत्र पर। यानी धन जारी करने की प्रक्रिया में उनका कोई प्रत्यक्ष रोल नहीं था।
दलील दी गई कि “जब धन का प्रवाह प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के जरिए हुआ और याचिकाकर्ता के पास वित्तीय नियंत्रण ही नहीं था, तो ‘आपराधिक विश्वासघात’ का सवाल ही नहीं उठता।”
राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता की भूमिका केवल कागजी नहीं थी। एक तकनीकी अधिकारी के रूप में उन्हें परियोजनाओं की निगरानी करनी थी।
सरकार ने तर्क दिया कि “जानबूझकर आंखें मूंद लेना” भी साजिश का हिस्सा हो सकता है। अगर परियोजनाएं उनके कार्यकाल में कागजों पर चल रही थीं, तो उन्हें मौके पर जाकर जांच करनी चाहिए थी।
राज्य का कहना था कि यह तय करना कि उनकी चुप्पी लापरवाही थी या साजिश, यह ट्रायल में ही स्पष्ट हो सकता है।
Read also:- ट्रांसफर विवाद पर सुलह: सिक्किम हाईकोर्ट ने आपसी समझ से खत्म की NHM कर्मचारी की याचिका
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति उदय कुमार ने पूरे रिकॉर्ड और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट कहा कि धारा 409 आईपीसी (आपराधिक विश्वासघात) के लिए “एंट्रस्टमेंट” यानी संपत्ति का सौंपा जाना और उस पर नियंत्रण होना अनिवार्य है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“सेक्शन 409 के तहत किसी जुर्म के लिए सौंपना, उसकी जान होती है। अगर आरोपी को कभी कोई प्रॉपर्टी या पैसा नहीं दिया गया, तो गलत इस्तेमाल का सवाल कानूनी तौर पर शुरू से ही खत्म हो जाता है।”
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास वित्तीय नियंत्रण नहीं था। धन बीडीओ और प्रधान के माध्यम से जारी हुआ। तकनीकी प्रमाणन के जिन दस्तावेजों के आधार पर धन जारी होना चाहिए था, उन पर उनके हस्ताक्षर नहीं थे।
न्यायालय ने इसे “Dominion Gap” यानी नियंत्रण की कमी बताया।
‘Temporal Impossibility’ का सिद्धांत
अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया-समय का अंतर। जिन परियोजनाओं में गड़बड़ी हुई, वे 2015 में ही वित्तीय रूप से पूर्ण हो चुकी थीं, जबकि याचिकाकर्ता ने 2016 में पद संभाला।
न्यायालय ने कहा कि
“एक व्यक्ति को उस साजिश का हिस्सा नहीं माना जा सकता, जो उसके पद संभालने से पहले ही पूरी हो चुकी हो।”
अदालत ने प्रशासनिक लापरवाही और आपराधिक मंशा के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
अंतिम फैसला
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन “पद के आधार पर संबंध” स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, न कि “कृत्य के आधार पर।”
अदालत ने आदेश दिया:
- याचिका स्वीकार की जाती है।
- एफआईआर और चार्जशीट याचिकाकर्ता के संबंध में रद्द की जाती है।
- याचिकाकर्ता को जमानत बंधन से मुक्त किया जाता है।
- विभाग चाहे तो प्रशासनिक जांच कर सकता है।
- ट्रायल कोर्ट अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखेगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग किसी को अनावश्यक रूप से परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता।
Case Title: Arko Deep Saha @ Arkadeep Saha vs State of West Bengal & Anr.
Case No.: CRR 1892 of 2022
Decision Date: 20 February 2026










