दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम आपराधिक याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा है कि वैध और चिकित्सकीय निगरानी में किया गया गर्भपात अपराध नहीं है। कोर्ट ने धारा 312 IPC के तहत महिला को तलब करने के आदेश को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि महिला की प्रजनन स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है।
यह फैसला न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता महिला के पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी ने 14 सप्ताह की गर्भावस्था में उसकी सहमति के बिना गर्भपात कराया, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 312 के तहत अपराध है। इस आधार पर निचली अदालत ने महिला को तलब किया था। हालांकि, पुनरीक्षण अदालत ने अन्य सभी आरोप हटाते हुए केवल धारा 312 IPC के तहत समन को बरकरार रखा।
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इसके बाद महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलील
महिला की ओर से दलील दी गई कि -
- गर्भपात पंजीकृत अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में हुआ
- गर्भ की अवधि 20 सप्ताह से कम थी
- वैवाहिक विवाद और मानसिक तनाव के कारण यह निर्णय लिया गया
- यह प्रक्रिया Medical Termination of Pregnancy (MTP) Act, 1971 के तहत पूरी तरह वैध है
महिला ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
अदालत का अवलोकन
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर रखे मेडिकल दस्तावेजों का जिक्र करते हुए कहा कि-
“महिला ने 14 सप्ताह की गर्भावस्था में वैवाहिक तनाव के चलते गर्भपात का विकल्प चुना, जिसे डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार वैध माना।”
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अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि-
“प्रजनन से जुड़ा निर्णय महिला की निजता, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल चिकित्सकीय बीमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वैवाहिक तनाव और सामाजिक परिस्थितियां भी गंभीर मानसिक आघात का कारण बन सकती हैं।
MTP Act पर अदालत की व्याख्या
हाईकोर्ट ने कहा कि-
- 20 सप्ताह तक गर्भपात डॉक्टर की राय पर किया जा सकता है
- मानसिक स्वास्थ्य को भी “grave injury” माना जाएगा
- महिला की वास्तविक और संभावित सामाजिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
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अदालत के अनुसार, वैवाहिक कलह जैसी स्थिति में महिला को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
अदालत ने स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि-
“इस मामले में धारा 312 IPC के तहत कोई अपराध नहीं बनता।”
इसके साथ ही,
- पुनरीक्षण अदालत का आदेश रद्द किया गया
- महिला को सभी आरोपों से डिस्चार्ज कर दिया गया
याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
Case Title: X v. State (NCT of Delhi) & Anr.
Case Number: CRL.M.C. 7984/2025










