सुप्रीम कोर्ट ने जालसाजी और धोखाधड़ी के गंभीर आरोपों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जब जांच जारी हो और दस्तावेज़ों की फोरेंसिक जांच बाकी हो, तब FIR को समय से पहले रद्द करना उचित नहीं है। अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें FIR को प्रारंभिक चरण में ही खत्म कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में अपीलकर्ता शारला बाजलियल ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने उनके पिता डॉ. जी.बी. बाजलियल की कमजोर मानसिक और शारीरिक स्थिति का फायदा उठाकर परिवार की पैतृक संपत्ति हड़पने की साजिश रची।
शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने कथित तौर पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज़ और आपराधिक साजिश के जरिए बैंक खातों और जमीन से जुड़ी संपत्ति अपने नाम करवाने का प्रयास किया।
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एफआईआर में कहा गया कि लगभग 1.18 करोड़ रुपये उनके पिता के बैंक खातों से आरोपी दलजीत सिंह के खाते में स्थानांतरित किए गए। इसके अलावा परिवार की कृषि भूमि भी कथित तौर पर बाजार दर से काफी कम कीमत पर बेच दी गई।
इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 465, 467, 468, 471 और 120-B के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
हालांकि, आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर CrPC की धारा 482 के तहत FIR को रद्द करने की मांग की, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि FIR में लगाए गए आरोप पर्याप्त नहीं हैं और उनमें धोखाधड़ी या जालसाजी के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होते।
इसी आधार पर अदालत ने कहा कि शिकायत केवल अनुमान और आशंकाओं पर आधारित है और इसलिए FIR को रद्द किया जा सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण से असहमति जताई।
पीठ ने कहा कि जब जांच एजेंसी पहले ही दस्तावेज़ों को फोरेंसिक साइंस लैब (SFSL) भेज चुकी थी और हस्ताक्षरों की जांच जारी थी, तब FIR को रद्द करना जल्दबाजी का कदम था।
अदालत ने कहा:
“जब जालसाजी के आरोपों वाले दस्तावेज़ों की जांच विशेषज्ञ द्वारा की जा रही हो, तब उसकी रिपोर्ट आने से पहले FIR को रद्द करना न्यायसंगत नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच के दौरान मिले तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि दस्तावेज़ों पर मौजूद हस्ताक्षर संभवतः फर्जी थे और संपत्ति के हस्तांतरण में धोखाधड़ी की आशंका बनती है।
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पीठ ने स्पष्ट किया कि FIR में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर आपराधिक अपराधों की ओर संकेत करते हैं और ऐसे मामलों में अदालत को शुरुआती चरण में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी 2024 को पारित हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वह जांच जल्द पूरी करे और यदि रिपोर्ट पहले ही दाखिल हो चुकी है तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही करे।
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अपील के निर्णय तक सीमित हैं और मामले के अंतिम ट्रायल को प्रभावित नहीं करेंगी।
Case Title: Sharla Bazliel v. Baldev Thakur & Ors.










