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पति-पत्नी के बीच संपत्ति विवाद केवल फैमिली कोर्ट में ही सुना जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच संपत्ति विवाद केवल फैमिली कोर्ट में सुना जा सकता है। सिविल कोर्ट का फैसला अधिकार क्षेत्र के अभाव में रद्द कर दिया गया। - Sachin Kumar v. Smt. Nidhi Dohre & Another

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पति-पत्नी के बीच संपत्ति विवाद केवल फैमिली कोर्ट में ही सुना जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच संपत्ति से जुड़े विवादों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आती है। अदालत ने पाया कि गाजियाबाद की सिविल कोर्ट ने जिस मामले का फैसला दिया था, वह उसके अधिकार क्षेत्र में ही नहीं था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने सचिन कुमार बनाम श्रीमती. निधि दोहरे एवं अन्य मामले में पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत तब हुई जब अपीलकर्ता सचिन कुमार ने दावा किया कि वर्ष 2017 में उन्होंने गाजियाबाद के आदित्य वर्ल्ड सिटी में एक फ्लैट खरीदा था। उन्होंने कहा कि फ्लैट की पूरी कीमत उन्होंने अपनी आय से चुकाई थी, लेकिन “प्रेम और स्नेह” के कारण पत्नी निधि दोहरे का नाम भी संयुक्त मालिक के रूप में जोड़ दिया गया था।

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पति का कहना था कि बाद में दंपत्ति के बीच विवाद हो गया और पत्नी घर छोड़कर चली गई। इसके बाद कई वैवाहिक और आपराधिक मुकदमे भी शुरू हुए। इसी बीच पति ने अदालत से मांग की कि बिल्डर को निर्देश दिया जाए कि फ्लैट की रजिस्ट्री केवल उनके नाम पर की जाए और पत्नी को उसमें हस्तक्षेप से रोका जाए।

हालांकि, गाजियाबाद की ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि संपत्ति पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर है, इसलिए केवल पति के पक्ष में बिक्री विलेख (Sale Deed) करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि विवाद मूल रूप से पति और पत्नी के बीच संपत्ति अधिकार से जुड़ा है।

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पीठ ने पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 7 का हवाला देते हुए कहा कि विवाह से जुड़े पक्षों के बीच संपत्ति संबंधी विवादों की सुनवाई केवल फैमिली कोर्ट ही कर सकती है।

अदालत ने स्पष्ट कहा:

“पति-पत्नी के बीच संपत्ति से संबंधित विवाद फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि जिस सिविल कोर्ट ने मामले का फैसला दिया, उसके पास इस प्रकार के विवाद की सुनवाई का निहित अधिकार (inherent jurisdiction) ही नहीं था।

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पीठ ने कहा कि जब किसी अदालत के पास मूल अधिकार ही नहीं होता, तो उसका दिया गया निर्णय कानून की नजर में शून्य (nullity) माना जाता है और वह res judicata के रूप में बाध्यकारी भी नहीं होता।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने गाजियाबाद की ट्रायल कोर्ट द्वारा 19 अक्टूबर 2024 को पारित निर्णय और डिक्री को रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि मूल वाद (Original Suit No. 544 of 2020) को पुनः बहाल किया जाए और वादपत्र (plaint) को उचित अधिकार क्षेत्र वाली फैमिली कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए।

साथ ही, संबंधित फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वादपत्र प्राप्त होने के बाद मामले का छह महीने के भीतर कानून के अनुसार निपटारा किया जाए और अनावश्यक स्थगन न दिया जाए।

Case Title: Sachin Kumar v. Smt. Nidhi Dohre & Another

Case Number: First Appeal No. 95 of 2026

Decision Date: 10 February 2026

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