मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

लॉ ऑफिसर परीक्षा विवाद: जब जजों में ही मतभेद हो, तो छात्र से सही उत्तर की उम्मीद नहीं- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने लॉ ऑफिसर भर्ती विवाद में अहम फैसला देते हुए कहा कि विवादित MCQ प्रश्न के दोनों उत्तर संभव हैं और दोनों उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त पद बनाया जाए। - चरण प्रीत सिंह बनाम नगर निगम चंडीगढ़ और अन्य।

Shivam Y.
लॉ ऑफिसर परीक्षा विवाद: जब जजों में ही मतभेद हो, तो छात्र से सही उत्तर की उम्मीद नहीं- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ नगर निगम में लॉ ऑफिसर भर्ती विवाद से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि विवादित प्रश्न के दोनों उत्तर तार्किक रूप से सही माने जा सकते हैं। इसलिए न्यायालय ने दोनों उम्मीदवारों को नियुक्त करने के लिए अतिरिक्त (Supernumerary) पद सृजित करने का निर्देश दिया।

यह मामला नगर निगम चंडीगढ़ में लॉ ऑफिसर के एक पद की भर्ती परीक्षा से जुड़ा था, जिसमें एक MCQ प्रश्न के सही उत्तर को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।

मामले की पृष्ठभूमि

चंडीगढ़ नगर निगम ने विधि अधिकारी के एक पद सहित कई पदों के लिए भर्ती अधिसूचना जारी की है, जिन्हें 100 बहुविकल्पीय प्रश्नों वाली लिखित परीक्षा के माध्यम से भरा जाएगा।

Read also:- सेकेंडरी एविडेंस पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी, कहा - जब मूल दस्तावेज हो तो कॉपी स्वीकार नहीं

इस परीक्षा में चरन प्रीत सिंह और अमित कुमार शर्मा दोनों ने आवेदन किया था। विवाद प्रश्न संख्या 73 को लेकर उत्पन्न हुआ।

प्रश्न था कि संविधान की किस अनुसूची को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से प्रतिरक्षा (immunity) प्राप्त है।?

विकल्पों में शामिल थे:

  • सातवीं अनुसूची
  • नौवीं अनुसूची
  • दसवीं अनुसूची
  • उपरोक्त में से कोई नहीं

भर्ती प्राधिकरण ने “नौवीं अनुसूची (Option B)” को सही उत्तर माना, जबकि अमित कुमार शर्मा ने “इनमें से कोई नहीं (Option D)” को सही बताया।

इस उत्तर के कारण, शर्मा को नकारात्मक अंकन के चलते 1.25 अंक का नुकसान हुआ, जिससे चयन सूची में उनकी रैंकिंग प्रभावित हुई।

Read also:- CrPC धारा 319: मामूली विरोधाभास के आधार पर अतिरिक्त आरोपी को ट्रायल से बाहर नहीं रखा जा सकता - सुप्रीम कोर्ट

शुरुआत में, शर्मा ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष उत्तर कुंजी को चुनौती दी थी।

सिंगल जज ने भर्ती प्राधिकरण के उत्तर को सही माना और कहा कि अनुच्छेद 31B के तहत नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती से प्रतिरक्षा प्राप्त है।

हालांकि, डिवीजन बेंच ने इस निर्णय को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार नौवीं अनुसूची पूर्णतः न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है, क्योंकि इसे बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत के आधार पर जांचा जा सकता है।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रश्न का उत्तर तय करना आसान नहीं था क्योंकि इसके लिए कई संवैधानिक फैसलों की व्याख्या करनी पड़ती है।

कोर्ट ने कहा कि जब हाई कोर्ट के जजों के बीच भी सही उत्तर को लेकर मतभेद हो सकता है, तो प्रतियोगी परीक्षा में बैठे कानून के छात्रों से पूर्णत: सही निष्कर्ष निकालने की अपेक्षा करना उचित नहीं है।

Read also:- मोटर दुर्घटना मुआवज़े से ग्रुप इंश्योरेंस राशि नहीं घटेगी: सुप्रीम कोर्ट

न्यायालय ने कहा कि:

“कानून के छात्र के दृष्टिकोण से दोनों उत्तर संभव हैं। भाषा के आधार पर विकल्प ‘B’ उपयुक्त लगता है, लेकिन संवैधानिक न्यायशास्त्र के विस्तृत विश्लेषण से विकल्प ‘D’ भी सही माना जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि चंडीगढ़ नगर निगम दोनों उम्मीदवारों को समायोजित करे।

इसके लिए नगर निगम को एक अतिरिक्त (Supernumerary) पद बनाकर अमित कुमार शर्मा को नियुक्त करने का आदेश दिया गया।

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले से नियुक्त चरन प्रीत सिंह की वरिष्ठता बरकरार रहेगी।

इस तरह अदालत ने दोनों पक्षों के हितों को संतुलित करने का प्रयास किया।

Case Title: Charan Preet Singh v Municipal Corporation Chandigarh & Ors.

Case Number: Civil Appeal No. 3446 of 2026 (Arising out of SLP (C) No.16533/2025)

Judge: Justice Sanjay Karol, Justice Prashant Kumar Mishra

Decision Date: March 17, 2026

More Stories