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पत्रकारिता पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: वसूली के लिए प्रेस की आज़ादी का इस्तेमाल नहीं कर सकते पत्रकार

लखन सिंह सोलंकी बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य, पत्रकार पर ब्लैकमेलिंग के आरोप वाले मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला-धोखाधड़ी का आरोप खत्म, जबरन वसूली का ट्रायल जारी रहेगा।

Vivek G.
पत्रकारिता पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: वसूली के लिए प्रेस की आज़ादी का इस्तेमाल नहीं कर सकते पत्रकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्रकार से जुड़े एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि पत्रकारिता लोकतंत्र का अहम स्तंभ है, लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता का इस्तेमाल अवैध लाभ कमाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने धोखाधड़ी (धारा 420 IPC) के आरोप को रद्द कर दिया, जबकि वसूली (धारा 384 IPC) से संबंधित कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सिवनी जिले के घंसौर थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता कोकलाल यादव ने आरोप लगाया कि 18 जुलाई 2023 को एक बैठक के दौरान लक्ष्मण सिंह सोलंकी नामक व्यक्ति ने खुद को “प्रदेश टुडे” अखबार का पत्रकार बताया।

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शिकायत के अनुसार, आरोपी ने कहा कि घंसौर में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की स्मृति में बन रहा स्मारक कथित तौर पर “गौठान” जमीन पर बिना जरूरी अनुमति के बनाया जा रहा है।

आरोप है कि आरोपी ने कहा कि यदि 10,000 रुपये नहीं दिए गए तो वह इस निर्माण से जुड़े लोगों के खिलाफ नकारात्मक खबर प्रकाशित कर देगा। शिकायतकर्ता ने पैसे देने से इनकार किया। बाद में 22 जुलाई 2023 को अखबार में इस निर्माण से जुड़ी अनियमितताओं पर एक खबर प्रकाशित हुई, जिसे शिकायतकर्ता ने झूठा और बदनाम करने वाला बताया।

इसके बाद 5 अगस्त 2023 को घंसौर थाने में धारा 384 (जबरन वसूली) और 420 (धोखाधड़ी) IPC के तहत एफआईआर दर्ज की गई और जांच के बाद चार्जशीट भी दाखिल की गई।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वह 2018 से घंसौर में “प्रदेश टुडे” का ब्यूरो चीफ है और उसने सिर्फ पत्रकारिता के कर्तव्य का पालन करते हुए खबर प्रकाशित की थी।

वकील ने अदालत को बताया कि 19 जुलाई 2023 को गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के स्थानीय नेताओं ने जिला कलेक्टर को एक ज्ञापन दिया था, जिसमें स्मारक निर्माण को लेकर आपत्ति जताई गई थी।

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याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने उसी ज्ञापन के आधार पर समाचार प्रकाशित किया और इसमें कोई आपराधिक मंशा नहीं थी। उनका तर्क था कि न तो धोखाधड़ी हुई और न ही किसी को धोखे से संपत्ति देने के लिए प्रेरित किया गया। इसलिए मामला रद्द किया जाना चाहिए।

राज्य की दलील

सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि एफआईआर में स्पष्ट आरोप है कि आरोपी ने 10,000 रुपये की मांग की और पैसे न देने पर खबर प्रकाशित करने की धमकी दी।

राज्य ने यह भी कहा कि शिकायत में जिन गवाहों का जिक्र किया गया है, उन्होंने भी जांच के दौरान इसी तरह के बयान दिए हैं। इसलिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है और इसे ट्रायल में परखा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए धोखा देना, झूठा प्रलोभन देना और उसके आधार पर संपत्ति दिलवाना जरूरी तत्व हैं।

अदालत ने पाया कि एफआईआर के आरोपों में ऐसा कोई तत्व नहीं दिखता जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता को धोखा देकर संपत्ति दिलवाई गई।

अदालत ने कहा: “यदि एफआईआर के सभी आरोपों को सही मान भी लिया जाए, तब भी धोखाधड़ी के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते।”

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि जबरन वसूली की परिभाषा में किसी व्यक्ति को उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर पैसे मांगना भी शामिल हो सकता है।

पीठ ने टिप्पणी की: “पत्रकारिता लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और पत्रकार समाज के प्रहरी की भूमिका निभाते हैं। लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता को अवैध लाभ कमाने का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।”

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि:

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट मामले की सुनवाई करते समय हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का मूल्यांकन करेगी।

Case Title: Lakhan Singh Solanki vs State of Madhya Pradesh & Others

Case No.: MCRC No. 43258 of 2024

Decision Date: 25 February 2026

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