कोलकाता हाईकोर्ट ने एक चर्चित वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए पति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रखने का निर्देश दिया, लेकिन देवर के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने साफ कहा—सिर्फ रिश्तेदार होने से आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, आरोप ठोस और स्पष्ट होने चाहिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति उदय कुमार ने CRR 882 of 2022 में पारित किया, जिसकी सुनवाई 6 फरवरी 2026 को पूरी हुई और फैसला 20 फरवरी 2026 को सुनाया गया।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता आशीष कुमार दत्ता और उनके भाई तपस कुमार दत्ता के खिलाफ 2017 में बनत्रा थाने में दहेज उत्पीड़न, मारपीट और स्ट्रिडन के गबन का मामला दर्ज हुआ था। शिकायतकर्ता पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद से ही एक चार पहिया वाहन खरीदने के लिए ₹1,00,000 की मांग की जा रही थी।
पत्नी का कहना था कि 30 मार्च 2017 को उसे मारपीट कर “एक कपड़े में” घर से निकाल दिया गया। वहीं पति का पक्ष अलग था। उन्होंने दावा किया कि पत्नी स्वेच्छा से अपने पिता के साथ घर छोड़कर गईं और उसी दिन पिता ने एक “नो-कम्प्लेंट” पत्र भी दिया।
जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी, जिसके खिलाफ यह रिवीजन याचिका दायर की गई।
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याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत में कहा कि यह मामला पति द्वारा दायर वैवाहिक वाद का “काउंटर-ब्लास्ट” है। उन्होंने तर्क दिया कि 12 साल की शादी के बाद अचानक दहेज की शिकायत करना स्वाभाविक नहीं लगता।
देवर के खिलाफ आरोपों को “सामान्य और अस्पष्ट” बताते हुए कहा गया कि कोई तारीख, समय या विशेष घटना का जिक्र नहीं है। इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग होगा।
राज्य और पत्नी का पक्ष
राज्य की ओर से कहा गया कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल है। ऐसे में हाईकोर्ट को साक्ष्यों का मूल्यांकन कर “मिनी ट्रायल” नहीं करना चाहिए।
“नो-कम्प्लेंट” पत्र की सच्चाई और परिस्थितियां ट्रायल में ही तय होंगी, यह दलील दी गई। अदालत को केवल यह देखना है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
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अदालत की टिप्पणी
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि धारा 498A का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू उत्पीड़न से सुरक्षा देना है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि पूरे परिवार को बिना ठोस आधार के मुकदमे में न घसीटा जाए।
अदालत ने टिप्पणी की, “केवल संबंध के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। प्रत्येक आरोपी की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।”
देवर के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत ने “सामान्य और ओम्निबस” बताते हुए कहा कि इनमें कोई विशिष्ट घटना या प्रत्यक्ष कृत्य का उल्लेख नहीं है।
हालांकि पति के मामले में अदालत ने पाया कि ₹1,00,000 की मांग और 30 मार्च 2017 की कथित मारपीट व निष्कासन जैसे आरोप “विशिष्ट” हैं।
अदालत ने कहा, “नो-कम्प्लेंट पत्र एक बचाव का दस्तावेज हो सकता है, पर उसकी सत्यता का परीक्षण साक्ष्य और जिरह के जरिए ही होगा।”
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अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए देवर तपस कुमार दत्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। उनके जमानती बंधन भी समाप्त कर दिए गए।
लेकिन पति आशीष कुमार दत्ता के खिलाफ मुकदमा जारी रखने का आदेश दिया गया। अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह बिना किसी पूर्वाग्रह के, कानून के अनुसार सुनवाई पूरी करे।
मामला इस प्रकार आंशिक रूप से निपटाया गया और किसी भी प्रकार की लागत का आदेश नहीं दिया गया।
Case Title: Ashis Kumar Dutta & Anr. vs State of West Bengal & Ors.
Case No.: CRR 882 of 2022
Decision Date: 20 February 2026










