दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के मामले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप अत्यंत सामान्य, अस्पष्ट और बिना ठोस घटनाओं के विवरण के थे, जिनसे आपराधिक अपराध का प्रथमदृष्टया मामला नहीं बनता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जब विवाह पहले ही वैध तलाक के आदेश से समाप्त हो चुका हो, तब बाद में दर्ज की गई घरेलू हिंसा की शिकायत टिकाऊ नहीं रह सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में पति संदीप पाठक और पत्नी ललिता तिवारी की शादी 25 जनवरी 2005 को उत्तराखंड के हल्द्वानी में हुई थी। शादी के बाद पत्नी कुछ ही दिनों तक पति के पैतृक घर रानीखेत में रही और बाद में दिल्ली लौट गई।
याचिका के अनुसार दोनों के बीच साथ रहने को लेकर मतभेद बने रहे और वे लंबे समय तक अलग रहे। इसके बाद पति ने 2011 में उत्तराखंड की अदालत में तलाक की याचिका दाखिल की।
अदालत ने 5 सितंबर 2012 को पति के पक्ष में एकतरफा तलाक की डिक्री दे दी। बाद में पत्नी ने दिल्ली में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत दाखिल की और 2013 में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 406 के तहत एफआईआर भी दर्ज करवाई।
इसके बाद पति और उसके परिवार के सदस्यों ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इन सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने की मांग की।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने शिकायत और एफआईआर में लगाए गए आरोपों की विस्तार से समीक्षा की।
अदालत ने पाया कि शिकायत में कई सदस्यों के खिलाफ सामूहिक और सामान्य आरोप लगाए गए थे, लेकिन किसी विशेष घटना, तारीख या ठोस विवरण का उल्लेख नहीं था।
पीठ ने कहा कि केवल वैवाहिक मतभेद या सामान्य पारिवारिक विवाद को दहेज उत्पीड़न के अपराध में नहीं बदला जा सकता।
अदालत ने कहा,
“शिकायत में लगाए गए आरोप अत्यंत सामान्य और अस्पष्ट हैं। इनमें ऐसा कोई विशिष्ट विवरण नहीं है जिससे धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध स्थापित हो सके।”
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स्ट्रिधन से जुड़े आरोपों पर भी अदालत ने पाया कि शिकायत में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन-सी वस्तु किसे सौंपी गई थी या किसने उसे लौटाने से इनकार किया।
पीठ ने कहा,
“सिर्फ ‘जेवर’ जैसे सामान्य शब्दों का उपयोग किया गया है, बिना किसी विवरण के। ऐसे आरोपों से आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बनता।”
अदालत ने यह भी माना कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत भी उन्हीं सामान्य आरोपों पर आधारित थी, जो एफआईआर में लगाए गए थे।
साथ ही अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि तलाक की डिक्री 5 सितंबर 2012 को पारित हो चुकी थी और उसे चुनौती भी नहीं दी गई थी।
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इस संबंध में अदालत ने कहा,
“जब वैध तलाक के आदेश से विवाह समाप्त हो चुका हो, तब घरेलू संबंध समाप्त हो जाता है और ऐसे में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्रवाई की बुनियादी शर्त ही समाप्त हो जाती है।”
इन सभी तथ्यों को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होता है।
अदालत ने एफआईआर संख्या 252/2013 (धारा 498A/406/34 IPC) तथा घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायर शिकायत—दोनों को रद्द कर दिया।
इसके साथ ही याचिकाएं स्वीकार करते हुए संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियां समाप्त कर दी गईं।
Case Title: Sandeep Pathak & Ors. v. Lalita Tiwari & Ors.
Case Numbers: CRL.M.C. 297/2021 & CRL.M.C. 485/2021
Decision Date: 10 March 2026









