सुप्रीम कोर्ट ने नवनीश अग्रवाल, उनके पिता और मां के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। इन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 406, 498-A और 506 के तहत मामला दर्ज था। यह फैसला पति-पत्नी के बीच आपसी तलाक और समझौते के बाद आया है।
यह मामला 15 मई 2019 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसे पत्नी (प्रत्यर्थी संख्या 2) ने यमुनानगर, हरियाणा में दर्ज कराया था। इसमें क्रूरता, आपराधिक धमकी और विश्वासघात के आरोप लगाए गए थे। 7 नवंबर 2019 को इस मामले में चार्जशीट दाखिल हुई थी। दंपति का विवाह मार्च 2018 में हुआ था, लेकिन 10 महीने के भीतर ही अलगाव हो गया। पत्नी की पहली शादी से एक बेटी भी थी।
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19 जनवरी 2024 को फैमिली कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक मंजूर किया, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच सभी लंबित विवाद सुलझा लिए गए और वापस ले लिए गए। पत्नी ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बच्चे के उत्पीड़न के आरोपों का हवाला देकर याचिका खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जब विवाह समाप्त हो चुका है और दोनों पक्ष अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं, तो मुकदमे को जारी रखना किसी उद्देश्य को पूरा नहीं करता और केवल कटुता को बढ़ाता है। पीठ ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में परिवार के सदस्यों को अनावश्यक रूप से फंसाने से बचना चाहिए और आपराधिक कानून के दुरुपयोग को रोकना जरूरी है।
"जब वैवाहिक संबंध तलाक के साथ समाप्त हो चुके हों… बिना ठोस आरोपों के परिवार के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना उचित नहीं है," अदालत ने कहा।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर और संबंधित कार्यवाही को खत्म कर दिया, यह कहते हुए कि अब अभियोजन शिकायतकर्ता की इच्छा के अनुरूप नहीं है और यह केवल उत्पीड़न होगा।
केस का शीर्षक:- नवनीश अग्रवाल एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य
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