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ड्रग्स एक्ट केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रिकॉर्ड गड़बड़ी पर चलेगा ट्रायल, लिमिटेशन दलील खारिज

मेसर्स एसबीएस बायोटेक एंड अदर्स बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने एसबीएस बायोटेक केस में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत रिकॉर्ड गड़बड़ी को गंभीर मानते हुए अपील खारिज की, लिमिटेशन दलील ठुकराई।

Vivek G.
ड्रग्स एक्ट केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रिकॉर्ड गड़बड़ी पर चलेगा ट्रायल, लिमिटेशन दलील खारिज

नई दिल्ली की अदालत में गुरुवार को एक अहम आपराधिक अपील पर फैसला सुनाया गया। मामला दवा निर्माण से जुड़ा है, और सवाल यह था कि क्या सिर्फ रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियों के आधार पर कड़ी सजा वाली धाराएं लग सकती हैं या नहीं।

में दर्ज फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा - अगर आरोप दवा निर्माण से जुड़े नियमों के उल्लंघन के हैं, तो मामला गंभीर माना जाएगा और ट्रायल चलेगा।

यह अपील M/s SBS Biotech & Others बनाम State of Himachal Pradesh में दायर की गई थी।

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पृष्ठभूमि: क्या है पूरा मामला?

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित एक फार्मा कंपनी के यहां 22 जुलाई 2014 को ड्रग इंस्पेक्टर ने निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कंपनी के रिकॉर्ड में कई कमियां पाई गईं।

आरोप था कि:

  • शेड्यूल M और शेड्यूल U के तहत जरूरी रजिस्टर और दस्तावेज पूरे नहीं थे
  • कच्चे माल और तैयार दवा के स्टॉक में भारी अंतर था
  • कुछ एंट्री में कटिंग और सुधार किए गए थे
  • प्सूडोएफेड्रिन नामक दवा के बैच रिकॉर्ड में गड़बड़ी थी

इसके बाद रिकॉर्ड और दवा जब्त की गई। आगे चलकर 2017 में कंपनी और उसके जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दायर की गई।

विवाद क्या था?

अपीलकर्ताओं का कहना था कि मामला सिर्फ “रिकॉर्ड न रखने” या “जानकारी न देने” का है।

उन्होंने अदालत में दलील दी:

“Section 18B के तहत रिकॉर्ड में कमी का मामला बनता है, जिसकी सजा अधिकतम एक साल है। इसलिए CrPC की धारा 468 के तहत एक साल में शिकायत होनी चाहिए थी।”

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उनका तर्क था कि चूंकि शिकायत ढाई साल बाद दायर हुई, इसलिए यह समय-सीमा (limitation) से बाहर है।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मामला सत्र न्यायालय (Sessions Court) में नहीं बल्कि मजिस्ट्रेट के पास ही चलना चाहिए था।

राज्य का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि मामला सिर्फ रिकॉर्ड की साधारण कमी का नहीं है।

सरकारी वकील ने जोर देकर कहा:

“यह केवल दस्तावेजी चूक नहीं, बल्कि निर्माण और वितरण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता का मामला है। इसलिए Section 18(a)(vi) और Section 27(d) लागू होते हैं।”

Section 27(d) के तहत सजा एक से दो साल तक हो सकती है। ऐसे में तीन साल की लिमिटेशन लागू होगी।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस विपुल एम. पंचोली और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने विस्तार से कानून की धाराओं और शिकायत के आरोपों का विश्लेषण किया।

पीठ ने कहा:

“शिकायत में स्पष्ट आरोप हैं कि कंपनी ने शेड्यूल M और U के नियमों का उल्लंघन करते हुए निर्माण प्रक्रिया में गंभीर हेरफेर की।”

अदालत ने माना कि आरोप सिर्फ रिकॉर्ड न रखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दवा निर्माण की प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन से जुड़े हैं।

इसलिए Section 18(a)(vi) लागू होगा, जिसकी सजा Section 27(d) के तहत दी जाती है।

लिमिटेशन पर क्या कहा?

अदालत ने स्पष्ट कहा:

“Section 27(d) के तहत अधिकतम सजा दो साल है, इसलिए CrPC की धारा 468 के तहत तीन साल की समय-सीमा लागू होगी।”

चूंकि शिकायत दो साल छह महीने के भीतर दायर की गई थी, इसलिए यह समय-सीमा के भीतर है।

ट्रायल किस अदालत में?

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया था कि मामला मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षेप (summary) में चलना चाहिए।

लेकिन अदालत ने Section 32(2) और Section 36A का हवाला देते हुए कहा:

“Chapter IV के तहत आने वाले अपराध सत्र न्यायालय से नीचे की अदालत में नहीं चल सकते।”

इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा मामला सत्र न्यायालय को भेजना सही था।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

  • शिकायत में गंभीर आरोप हैं
  • समय-सीमा के भीतर मामला दर्ज हुआ
  • सत्र न्यायालय में ट्रायल भेजना कानून के अनुरूप है
  • हाईकोर्ट का आदेश सही है

अदालत ने कहा:

“High Court has not committed any error… no interference is required.”

इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गई।

Case Title: M/s SBS Biotech & Others v. State of Himachal Pradesh

Case No.: Criminal Appeal (arising out of SLP (Crl.) No. 9281 of 2025)

Decision Date: 20 February 2026

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