लंबे समय से लंबित एक दीवानी मुकदमे में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वादी को अपने वादपत्र (plaint) में संशोधन करने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि केवल देरी के आधार पर संशोधन की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती, खासकर तब जब मुकदमे का मूल स्वरूप नहीं बदल रहा हो।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत दोनों के आदेशों को निरस्त करते हुए वादी की संशोधन अर्जी स्वीकार कर ली।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 1997 में दायर एक दीवानी वाद से जुड़ा है। वादी ने पहले अदालत से अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की मांग की थी, जिसके तहत प्रतिवादियों को निर्माण हटाने और संपत्ति का कब्जा देने का आदेश देने की प्रार्थना की गई थी।
बाद में वादी ने वादपत्र में संशोधन की अर्जी दाखिल करते हुए मांग की कि उसे विवादित संपत्ति का कब्जा दिलाने से संबंधित राहत भी स्पष्ट रूप से जोड़ी जाए, साथ ही कुछ मामूली संशोधन भी किए जाएं।
हालांकि, गोरखपुर की निचली अदालत ने 16 नवंबर 2022 को यह कहते हुए संशोधन की अर्जी खारिज कर दी कि इसे काफी देर से दाखिल किया गया है। इसके खिलाफ दायर सिविल रिवीजन भी 10 अप्रैल 2023 को खारिज कर दी गई।
इसके बाद वादी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
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पक्षकारों की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि प्रस्तावित संशोधन से मुकदमे की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा। वादी केवल राहत के स्वरूप को स्पष्ट कर रहा है, जबकि विवाद वही संपत्ति और वही तथ्य हैं।
दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 6 नियम 17 के प्रावधान के तहत इतना देर से संशोधन स्वीकार नहीं किया जा सकता और इससे मुकदमे की प्रकृति बदल जाएगी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि प्रस्तावित संशोधन से मुकदमे की प्रकृति में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आता।
अदालत ने स्पष्ट किया:
“वादपत्र में मांगी गई राहत के मूल स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं है। इसलिए केवल इस आधार पर कि संशोधन देर से मांगा गया है, आवेदन को खारिज करना उचित नहीं है।”
अदालत ने यह भी कहा कि यह मुकदमा वर्ष 1997 का है, इसलिए CPC संशोधन अधिनियम 2002 के बाद जोड़े गए प्रावधान इस मामले पर लागू नहीं होते। इस संदर्भ में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले State Bank of Hyderabad v. Town Municipal Council का उल्लेख किया।
साथ ही अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य निर्णय Sampath Kumar v. Ayyakannu का हवाला देते हुए कहा कि केवल देरी को आधार बनाकर संशोधन आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता।
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अदालत का फैसला
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत के आदेशों को अवैध और अस्थिर मानते हुए उन्हें निरस्त कर दिया।
अदालत ने वादी की संशोधन अर्जी स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि वह तीन सप्ताह के भीतर वादपत्र में आवश्यक संशोधन करे।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि मुकदमा वर्ष 1997 से लंबित है, इसलिए गोरखपुर की निचली अदालत को इसे संभव हो तो छह महीने के भीतर कानून के अनुसार निपटाने का प्रयास करना चाहिए और अनावश्यक स्थगन से बचना चाहिए।
Case Title: Dayanand & 2 Others vs Mohan @ Ghure
Case No.: Matters Under Article 227 No. 5796 of 2023
Decision Date: 25 February 2026










