आर्बिट्रेशन से जुड़े मामलों में अंतरिम आदेशों पर अपील की सीमा को लेकर उठे एक अहम सवाल पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन अधिनियम के तहत दिया गया अंतरिम ‘स्टेटस-क्वो’ (Status Quo) आदेश, भले ही अस्थायी हो, उसके खिलाफ अपील सुनवाई योग्य है। यह फैसला विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी और दो निजी कंपनियों के बीच चल रहे वाणिज्यिक विवाद में आया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला Visakhapatnam Port Authority द्वारा दायर दो कमर्शियल कोर्ट अपीलों से जुड़ा है। ये अपीलें उस आदेश को चुनौती देती हैं, जिसमें विशाखापत्तनम की विशेष वाणिज्यिक अदालत ने आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 9 के तहत दायर याचिकाओं में पक्षकारों को यथास्थिति (status quo ante) बनाए रखने का निर्देश दिया था।
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विशेष न्यायाधीश ने 19 दिसंबर 2025 को यह अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा था कि अगली सुनवाई तक मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव न किया जाए। इसी आदेश के खिलाफ पोर्ट अथॉरिटी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
मुख्य कानूनी सवाल
हाईकोर्ट के सामने केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या धारा 9 के तहत पारित ऐसा अंतरिम या ‘एड-इंटरिम’ आदेश, जब मुख्य याचिका अभी लंबित हो, तब भी आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 37 के अंतर्गत अपील योग्य है या नहीं।
रजिस्ट्री ने शुरुआत में अपील की सुनवाई योग्यता (maintainability) पर आपत्ति उठाई थी। दलील दी गई कि चूंकि मामला अभी निचली अदालत में लंबित है और आदेश केवल अस्थायी है, इसलिए अपील नहीं बनती।
कोर्ट के अवलोकन
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचम की पीठ ने प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया। कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 37(1)(b) का हवाला देते हुए कहा कि इसमें “धारा 9 के तहत किसी भी उपाय को देने या न देने” के आदेश के खिलाफ अपील का स्पष्ट प्रावधान है।
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पीठ ने कहा:
“धारा 9 के तहत दिया गया अंतरिम ‘स्टेटस-क्वो’ आदेश भी एक प्रकार का अंतरिम निषेधाज्ञा (interim injunction) है। इसलिए यह धारा 37(1)(b) के दायरे में आता है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही आदेश अस्थायी हो, लेकिन उसका प्रभाव गंभीर हो सकता है, और ऐसे मामलों में अपील का अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
अन्य फैसलों पर चर्चा
हाईकोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि धारा 37 केवल अंतिम आदेशों पर लागू होती है। हालांकि, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने उस व्याख्या से असहमति जताई।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का संदर्भ देते हुए कहा कि जब कानून में अपील का रास्ता स्पष्ट रूप से दिया गया हो, तो उसे संकुचित रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।
अदालत का निर्णय
इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री की आपत्ति को खारिज कर दिया और कहा कि पोर्ट अथॉरिटी द्वारा दायर अपीलें सुनवाई योग्य हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलों को विधिवत संख्या दी जाए और आगे की सुनवाई तय की जाए।
साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश निचली अदालत को धारा 9 के तहत लंबित याचिकाओं पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने से नहीं रोकेगा।
Case Title:- The Visakhapatnam Port Authority v. M/s. Vishwanadh Avenues India Private Limited (and connected matter)
Case Numbers:- Commercial Court Appeal (SR) Nos. 53095 & 53096 of 2025










