बॉम्बे हाईकोर्ट ने दूरसंचार कंपनी GTL Infrastructure Limited के खिलाफ दर्ज CBI की एफआईआर को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच के बाद भी जब किसी आरोपी की पहचान नहीं हो सकी और ठोस आपराधिक कृत्य सामने नहीं आया, तो केवल “संभावना” के आधार पर आपराधिक जांच जारी नहीं रखी जा सकती।
चीफ जस्टिस एस चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि क्रिमिनल लॉ के प्रोसेस का इस्तेमाल "घूमते-फिरते इन्वेस्टिगेशन" के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला GTL इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा दाखिल एक रिट याचिका से जुड़ा था, जिसमें कंपनी ने 16 अगस्त 2023 को CBI द्वारा दर्ज एफआईआर को चुनौती दी थी। इस एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा120-B और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत अपराध का आरोप लगाया गया था।
CBI ने आरोप लगाया था कि कंपनी ने 19 बैंकों के कंसोर्टियम से लिए गए कर्ज से जुड़े लेन-देन में वित्तीय अनियमितताएं कीं और कुछ रकम विक्रेताओं के माध्यम से अन्य कंपनियों में निवेश कर दी। जांच के दौरान यह भी कहा गया कि कर्ज पुनर्गठन (CDR) और बाद में स्ट्रैटेजिक डेट रीस्ट्रक्चरिंग (SDR) की प्रक्रिया में बैंकों को भारी नुकसान हुआ।
जांच के अनुसार कुल लगभग ₹11,263 करोड़ के कर्ज में से लगभग ₹7,200 करोड़ को इक्विटी में बदला गया और शेष राशि की वसूली के लिए आगे की प्रक्रिया अपनाई गई।
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कंपनी का पक्ष
कंपनी ने अदालत में कहा कि उसने टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में विस्तार के लिए बैंकों से कर्ज लिया था और बाद में टेलीकॉम सेक्टर में आई गिरावट, 2G स्पेक्ट्रम मामले के फैसले और कई ऑपरेटरों के बाजार से बाहर होने जैसी परिस्थितियों के कारण कारोबार प्रभावित हुआ।
GTL का यह भी कहना था कि फोरेंसिक ऑडिट में किसी तरह की फंड डायवर्जन या धोखाधड़ी का पता नहीं चला। कंपनी ने यह भी बताया कि उसने समय के साथ बैंकों को बड़ी राशि चुका दी और कुछ बैंकों के साथ वन टाइम सेटलमेंट भी हुआ।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने कहा कि CBI ने प्रारंभिक जांच के बाद भी किसी भी आरोपी व्यक्ति या सार्वजनिक अधिकारी की पहचान नहीं की।
पीठ ने कहा,
“जब प्रारंभिक जांच में पर्याप्त सामग्री होने का दावा किया गया, तो एजेंसी को कम से कम यह बताना चाहिए था कि अपराध किसने किया।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में लेन-देन को असामान्य या संदिग्ध नहीं पाया गया। साथ ही आयकर सेटलमेंट कमीशन ने भी खरीद-फरोख्त को वास्तविक माना था।
पीठ ने कहा कि बैंकों द्वारा कर्ज पुनर्गठन या ऋण बेचने का फैसला एक व्यावसायिक निर्णय था और केवल असहमति या वित्तीय नुकसान के आधार पर उसे आपराधिक षड्यंत्र नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि
“आपराधिक न्याय प्रणाली को केवल इस उम्मीद में सक्रिय नहीं रखा जा सकता कि जांच एजेंसी किसी दिन आरोपी की पहचान कर लेगी।”
अदालत का फैसला
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेज एफआईआर के आरोपों को समर्थन नहीं देते। अदालत ने माना कि जांच जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।
नतीजतन, अदालत ने 16 अगस्त 2023 को दर्ज CBI की एफआईआर को रद्द कर दिया और GTL इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की याचिका स्वीकार कर ली।
Case Title: GTL Infrastructure Limited vs Central Bureau of Investigation & Anr.
Case No.: Writ Petition No. 3632 of 2024
Decision Date: 27 February 2026

