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चार्ज फ्रेम होने के बाद CrPC की धारा 216 या BNSS की धारा 239 के तहत नहीं हटाए जा सकते : सुप्रीम कोर्ट का फैसला

एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार जब CrPC की धारा 228 के तहत आरोप तय हो जाते हैं, तो उन्हें धारा 216 CrPC या BNSS की धारा 239 के तहत हटाया नहीं जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि मुकदमे का अंत या तो दोषमुक्ति या सजा पर ही होना चाहिए—न कि आरोपों को हटाकर।

Shivam Y.
चार्ज फ्रेम होने के बाद CrPC की धारा 216 या BNSS की धारा 239 के तहत नहीं हटाए जा सकते : सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 17 अप्रैल 2025 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि एक बार जब आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 228 के तहत आरोप तय कर दिए जाते हैं, तो अदालतें धारा 216 CrPC या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 239 के तहत उन आरोपों को हटा नहीं सकती। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि धारा 216 केवल नए आरोप जोड़ने या मौजूदा आरोपों में संशोधन की अनुमति देती है, न कि आरोपों को हटाने या आरोपी को बरी करने की।

"CrPC की धारा 216 की भाषा केवल आरोप जोड़ने या उसमें परिवर्तन करने की अनुमति देती है, हटाने या आरोपी को मुक्त करने की नहीं। यदि विधायिका का उद्देश्य ट्रायल कोर्ट को इस स्तर पर आरोप हटाने का अधिकार देना होता, तो वह स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख करती।" — सुप्रीम कोर्ट

मामले की पृष्ठभूमि

यह फैसला डायरेक्टरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस बनाम राज कुमार अरोड़ा एवं अन्य मामले में आया, जहां NDPS अधिनियम, 1985 के तहत बुप्रेनोर्फिन हाइड्रोक्लोराइड (Buprenorphine Hydrochloride) नामक साइकोट्रॉपिक पदार्थ के अवैध कब्ज़े और तस्करी के लिए आरोप तय किए गए थे।

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बाद में, ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 216 के तहत दायर एक आवेदन को स्वीकार करते हुए NDPS अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को हटा दिया और मामले को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट (D&C Act) के तहत मुकदमे के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय से असहमति जताई।

“इस स्तर पर आरोपी को या तो दोषमुक्त किया जाना चाहिए या दोषी ठहराया जाना चाहिए। कोई शॉर्टकट स्वीकार नहीं किए जाने चाहिए।” — सुप्रीम कोर्ट

यह निर्णय न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला द्वारा लिखा गया और न्यायमूर्ति पारदीवाला तथा मनोज मिश्रा की पीठ द्वारा सुनाया गया। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आरोप तय होने के बाद उन्हें हटाने की अनुमति देना न्यायिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाता है और CrPC की योजना के विरुद्ध है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि बुप्रेनोर्फिन हाइड्रोक्लोराइड, भले ही NDPS नियमों के अनुसूची I में शामिल न हो, NDPS अधिनियम की अनुसूची में शामिल है और इसलिए यह अधिनियम लागू होता है।

“NDPS अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपराध नहीं बनता यह कहना ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों की गलती थी… यह आपराधिक प्रक्रिया के भीतर स्वीकार्य नहीं है।” — सुप्रीम कोर्ट

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अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट दोनों के उन निर्णयों को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि क्योंकि बुप्रेनोर्फिन हाइड्रोक्लोराइड NDPS नियमों की अनुसूची I में नहीं है, इसलिए NDPS अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता।

निर्णय के मुख्य बिंदु

  1. CrPC की धारा 216 केवल आरोप जोड़ने या संशोधन करने की अनुमति देती है, हटाने की नहीं।
  2. एक बार CrPC की धारा 228 के तहत आरोप तय हो जाने के बाद, मुकदमे का अंत या तो दोषमुक्ति या सजा पर ही होना चाहिए।
  3. मुकदमे के बीच में आरोप हटाना भारतीय दंड प्रक्रिया में स्वीकार्य नहीं है।
  4. CrPC की धारा 216 का समतुल्य BNSS में धारा 239 है, जो भी आरोप हटाने की अनुमति नहीं देती।
  5. सुप्रीम कोर्ट ने देव नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले को भी अनुमोदित किया, जिसमें भी यही कहा गया था कि CrPC की धारा 216 के तहत आरोप हटाना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

"एक बार आरोप तय हो जाएं तो मुकदमा दोषमुक्ति या सजा पर समाप्त होना चाहिए, आरोपों को बीच में हटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।" — सुप्रीम कोर्ट

यह निर्णय पूरे देश की अदालतों को यह स्पष्ट करता है कि एक बार जब किसी आरोपी के खिलाफ आरोप तय हो जाएं, तो उन्हें प्रक्रिया का पालन करते हुए मुकदमे का सामना करना होगा और कोई प्रक्रियात्मक शॉर्टकट नहीं अपनाया जा सकता।

इसी के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले में संबंधित NDPS विशेष न्यायाधीश के समक्ष मुकदमा फिर से चलाया जाए, और उच्च न्यायालय के निर्णय को रद्द कर दिया।

केस का शीर्षक: राजस्व खुफिया निदेशालय बनाम राज कुमार अरोड़ा और अन्य।

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