भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चेक बाउंस मामलों में एक अहम कानूनी सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि अगर एक ही लेनदेन से जुड़े कई चेक अलग-अलग तारीखों पर बाउंस होते हैं, तो हर चेक के लिए अलग आपराधिक शिकायत दर्ज की जा सकती है। इस आधार पर शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को पलट दिया और एक शिकायत को बहाल कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद एक रियल एस्टेट सौदे से जुड़ा है। शिकायतकर्ता सुमित बंसल ने गाजियाबाद स्थित एक कमर्शियल प्रोजेक्ट में तीन यूनिट खरीदने के लिए लगभग 1.72 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। समझौते के मुताबिक, तय समय पर बिक्री विलेख (सेल डीड) न होने की स्थिति में पूरी राशि ब्याज/मुआवजे सहित लौटाई जानी थी।
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समय पर रजिस्ट्री नहीं हो सकी। इसके बाद डेवलपर फर्म और उसके मालिक की ओर से अलग-अलग खातों से कई चेक जारी किए गए कुछ फर्म के नाम से और कुछ व्यक्तिगत गारंटी के तौर पर। ये चेक अलग-अलग तारीखों पर बैंक में पेश किए गए और सभी बाउंस हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कई शिकायतें दायर कीं।
हाईकोर्ट का फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने शुरुआती दो शिकायतों में से एक को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि दोनों एक ही देनदारी से जुड़ी हैं और समान लेनदेन पर दो समानांतर आपराधिक मुकदमे नहीं चल सकते। हालांकि, बाद में जारी हुए अन्य चेकों से जुड़ी शिकायतों को हाईकोर्ट ने खारिज करने से इनकार कर दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि धारा 138 के तहत हर चेक का बाउंस अपने-आप में अलग कारण-ए-दावा (cause of action) पैदा करता है।
पीठ ने कहा,
“केवल इसलिए कि सभी चेक एक ही मूल लेनदेन से जुड़े हैं, यह नहीं माना जा सकता कि सभी शिकायतें एक ही होंगी। हर चेक अलग तारीख पर प्रस्तुत हुआ, अलग-अलग समय पर बाउंस हुआ और अलग नोटिस जारी हुआ।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह तय करना कि चेक ‘वैकल्पिक सुरक्षा’ थे या ‘अलग-अलग दायित्व’ दर्शाते हैं, तथ्यों का विवाद है, जिसे मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाएगा न कि प्रारंभिक स्तर पर शिकायत रद्द करके।
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धारा 482 CrPC पर रुख
पीठ ने हाईकोर्ट की उस प्रवृत्ति पर भी टिप्पणी की, जिसमें वह प्रारंभिक स्तर पर तथ्यों का आकलन कर “मिनी ट्रायल” करने लगती है। अदालत ने दोहराया कि धारा 482 के तहत शिकायत तभी रद्द की जा सकती है, जब पहली नजर में कोई अपराध बनता ही न हो। यहां ऐसा नहीं था।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए उस शिकायत को बहाल कर दिया, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द किया था। साथ ही, आरोपी की ओर से दायर अपीलें खारिज कर दी गईं।
अदालत ने कहा कि सभी शिकायतें ट्रायल कोर्ट में अपने-अपने गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ेंगी और बचाव पक्ष को अपनी दलीलें वहीं रखने का पूरा मौका मिलेगा।
Case Title:- Sumit Bansal v. M/s MGI Developers and Promoters & Another










