छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में न्यायपालिका के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत को निराधार बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल आशंका या संदेह के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक मामला शुरू नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने यह आदेश पारित करते हुए कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप ठोस तथ्यों के बजाय केवल आशंकाओं पर आधारित हैं।
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मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक आपराधिक शिकायत से जुड़ा है, जो वर्ष 2016 में रायपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर की गई थी। शिकायत एक महिला ने दर्ज कराई थी, जिनके पति उस समय छत्तीसगढ़ न्यायिक सेवा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि अरंग टोल प्लाजा पर 31 अक्टूबर 2015 को हुई एक घटना से जुड़े मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल नहीं की। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि इसके पीछे पुलिस अधिकारियों और न्यायपालिका के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की कथित साजिश थी।
इस शिकायत में उस समय के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, एक वर्तमान न्यायाधीश और कई न्यायिक अधिकारियों के नाम भी शामिल किए गए थे।
याचिकाकर्ता की दलील
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि यह शिकायत न्यायिक अधिकारियों को बदनाम करने और व्यक्तिगत शिकायतों को आपराधिक मामले का रूप देने का प्रयास है।
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वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि शिकायत में किसी भी न्यायाधीश या न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस आरोप या स्पष्ट घटना का विवरण नहीं दिया गया है।
उन्होंने दलील दी कि शिकायत केवल इस “आशंका” पर आधारित है कि चार्जशीट दाखिल नहीं होने के पीछे कोई साजिश हो सकती है।
प्रतिवादी पक्ष की दलील
शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत में कहा कि मामला अभी शुरुआती चरण में था और मजिस्ट्रेट ने केवल प्रारंभिक साक्ष्य दर्ज करने के लिए तारीख तय की थी।
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उनका तर्क था कि शिकायतकर्ता को कानून के तहत शिकायत दर्ज करने का अधिकार है और बिना साक्ष्य दर्ज किए उसे शुरुआत में ही रोकना उचित नहीं होगा।
साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायत में प्रशासनिक फैसलों, स्थानांतरण और सेवा से जुड़े विवादों को भी व्यापक साजिश का हिस्सा बताया गया है।
अदालत की टिप्पणियां
खंडपीठ ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं।
अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि दो या अधिक लोगों के बीच किसी अवैध काम के लिए स्पष्ट समझौता या योजना बनी हो।
पीठ ने कहा: “शिकायत में किसी भी न्यायाधीश या न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस घटना, तारीख, बैठक या समझौते का विवरण नहीं है। आरोप केवल आशंका और संदेह पर आधारित हैं।”
अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत या प्रशासनिक शिकायतों को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया।
इनमें State of Haryana v. Bhajan Lal, Pepsi Foods Ltd. v. Special Judicial Magistrate और Priyanka Shrivastava v. State of Uttar Pradesh जैसे फैसले शामिल हैं, जिनमें कहा गया है कि यदि शिकायत से कोई अपराध बनता ही नहीं है तो अदालत को ऐसे मामलों को शुरुआती चरण में ही रोकने का अधिकार है।
अदालत का फैसला
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से कोई आपराधिक अपराध प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होता।
अदालत ने माना कि शिकायत केवल अनुमान और संदेह पर आधारित है और इसे जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर अदालत ने रायपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत को उन न्यायिक अधिकारियों के संबंध में रद्द कर दिया और 26 मार्च 2016 के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उनके खिलाफ प्रारंभिक साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल उन आरोपियों तक सीमित रहेगा, जिनके खिलाफ पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।
Case Title: High Court of Chhattisgarh Through Registrar General v. State of Chhattisgarh & Others
Case No.: WPCR No. 88 of 2016
Decision Date: 28 February 2026










