गुजरात हाईकोर्ट ने वडोदरा स्थित ऐतिहासिक ‘बड़ा हजीरा’ परिसर में परिवार के सदस्यों को दफनाने के अधिकार से जुड़ी एक पुरानी कानूनी लड़ाई का अंत करते हुए सेकेंड अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता अपने कथित धार्मिक या पारंपरिक अधिकार को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।
न्यायमूर्ति जे.सी. दोषी की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यह स्थान एक संरक्षित स्मारक है और कानून के तहत वहां जमीन खोदकर दफनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वडोदरा के दांतेश्वर क्षेत्र में स्थित ‘बड़ा हजीरा’ नामक परिसर से जुड़ा है, जहां कुतुबुद्दीन मोहम्मद खान और उनके परिवार के कुछ सदस्यों की कब्रें मौजूद हैं।
याचिकाकर्ता पीरजादा सैयद बहाउद्दीन बी. कादरी ने दावा किया था कि वह कादरिया सिलसिले के धार्मिक गुरु (धर्म गुरु) हैं और उनके परिवार को उस परिसर के आसपास दफनाने का पारंपरिक अधिकार है।
उन्होंने अदालत से यह भी मांग की थी कि 4 फरवरी 1986 को वडोदरा कलेक्टर द्वारा जारी नोटिस को अवैध घोषित किया जाए। इस नोटिस में उन्हें परिसर में धार्मिक गतिविधियों और दफनाने जैसी गतिविधियों से रोक दिया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने शुरुआती दौर में याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया था। हालांकि बाद में अपीलीय अदालत ने उस फैसले को पलटते हुए राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली और मुकदमा खारिज कर दिया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में सेकेंड अपील दाखिल की।
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याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अपीलीय अदालत ने ऐसे दस्तावेजों पर भरोसा किया जो ट्रायल के दौरान विधिवत प्रदर्शित (exhibit) नहीं किए गए थे।
उनका कहना था कि जब तक अदालत दस्तावेजों की स्वीकार्यता तय नहीं करती, तब तक उन्हें साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता। इसलिए अपीलीय अदालत द्वारा ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटना गलत था।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उनके परिवार को पीढ़ियों से उस परिसर में दफनाने की परंपरा रही है और कानून भी धार्मिक परंपराओं को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करता।
राज्य सरकार की दलील
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अपीलीय अदालत ने जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया, वे नए दस्तावेज नहीं थे।
ये वही दस्तावेज थे जिन्हें खुद याचिकाकर्ता ने मुकदमे के दौरान रिकॉर्ड पर रखा था। इसलिए बाद में यह कहना कि अदालत उन्हें पढ़ नहीं सकती, उचित नहीं है।
सरकार ने यह भी बताया कि ‘बड़ा हजीरा’ को पहले ही 1938 में तत्कालीन बड़ौदा रियासत के महाराजा द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका था। बाद में स्वतंत्र भारत में भी इसे राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक माना गया।
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अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने कथित अधिकार को साबित करने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वह वास्तव में उस धार्मिक परंपरा के प्रमुख हैं या कुतुबुद्दीन के सीधे वंशज हैं।
अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने जिस पारंपरिक अधिकार का दावा किया, उसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
पीठ ने कहा,
“वादपत्र में केवल सामान्य दावे किए गए हैं, लेकिन यह साबित करने के लिए कोई प्रमाण नहीं दिया गया कि याचिकाकर्ता को ऐसा कोई पारंपरिक अधिकार प्राप्त है।”
संरक्षित स्मारक से जुड़ा कानूनी पहलू
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह स्थान Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958 के तहत संरक्षित है।
कानून के अनुसार ऐसे संरक्षित स्मारकों के आसपास जमीन खोदने या निर्माण जैसे कार्यों पर प्रतिबंध है।
पीठ ने कहा कि दफनाने के लिए जमीन एक फुट से अधिक गहराई तक खोदनी पड़ती है, जो इस कानून के तहत अनुमति नहीं है।
अदालत का अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में कोई “महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न” (substantial question of law) नहीं बनता, जो सेकेंड अपील में हस्तक्षेप का आधार हो सके।
इसी आधार पर अदालत ने सेकेंड अपील को खारिज कर दिया और निचली अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
Case Title: Pirzada Saiyed Bahauddin B. Kadri (Since Deceased) Through Heirs & Ors. vs State of Gujarat
Case No.: R/Second Appeal No. 27 of 2006
Decision Date: 11 February 2026










