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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट सख्त: आदेश की अवहेलना पर ट्रायल जज की भूमिका संदिग्ध, अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार के निर्देश

अशोक कुमार एवं अन्य बनाम श्रीमती मीरा देवी, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ट्रायल जज की लापरवाही पर सख्ती दिखाई। आदेश की अवहेलना मामले में जांच किसी अन्य जज से कराने और कार्रवाई पर विचार के निर्देश।

Vivek G.
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट सख्त: आदेश की अवहेलना पर ट्रायल जज की भूमिका संदिग्ध, अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार के निर्देश

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के रवैये पर कड़ी नाराज़गी जताई। अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ट्रायल जज ने न तो विधिवत जांच की और न ही गवाहों के बयान दर्ज किए।

इस पर कोर्ट ने कहा कि मामले को जिस तरह से संभाला गया, उससे न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही का संकेत मिलता है। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित ट्रायल जज के आचरण की जांच की आवश्यकता बताई।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अशोक कुमार और अन्य बनाम मीरा देवी से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि वर्ष 2013 में हाईकोर्ट ने विवादित संपत्ति को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस आदेश के बावजूद प्रतिवादियों ने विवादित भूमि पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया। इस कथित अवमानना को लेकर अदालत में आवेदन दायर किया गया।

4 अप्रैल 2024 को हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने कहा था कि यह तथ्य जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकता है कि वास्तव में आदेश का उल्लंघन हुआ या नहीं। इसलिए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया था कि वह इस मुद्दे पर जांच करे और चार महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करे।

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जांच में देरी और अदालत की नाराज़गी

समयसीमा के बावजूद ट्रायल कोर्ट से जांच रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई। इसके बाद हाईकोर्ट ने कई बार आदेश जारी किए और रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए।

8 अक्टूबर 2025 को भी अदालत ने नोट किया कि रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है और ट्रायल कोर्ट को तुरंत रिपोर्ट भेजने को कहा। इसके बाद 12 नवंबर 2025 को अदालत ने इस देरी पर नाराज़गी जताई और कहा कि एक साल छह महीने बीत जाने के बावजूद जांच पूरी नहीं हुई।

अदालत ने उस समय स्पष्ट कहा था कि यदि 31 दिसंबर 2025 तक जांच पूरी नहीं हुई तो ट्रायल कोर्ट के इस रवैये को गंभीरता से लिया जाएगा।

ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया पर सवाल

बाद में जो रिपोर्ट भेजी गई, उसमें पाया गया कि ट्रायल कोर्ट ने स्वयं जांच नहीं की। इसके बजाय लोक निर्माण विभाग (PWD) के कार्यपालन यंत्री से स्थल निरीक्षण रिपोर्ट मंगाकर उसे ही आगे भेज दिया।

हाईकोर्ट ने इसे अनुचित बताया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को गवाहों के बयान दर्ज करने चाहिए थे और उसके बाद यह तय करना चाहिए था कि अंतरिम आदेश का उल्लंघन हुआ या नहीं।

अदालत ने कहा:

“ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयान दर्ज किए बिना ही रिपोर्ट भेज दी। यह जांच की प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि स्थल निरीक्षण रिपोर्ट पक्षकारों की अनुपस्थिति में तैयार की गई थी।

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जिला न्यायाधीश की रिपोर्ट

इस बीच प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, भिंड से विस्तृत रिपोर्ट मंगाई गई। जांच में यह पाया गया कि संबंधित ट्रायल जज ने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही दिखाई।

हालांकि ट्रायल जज ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी मांगी, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है क्योंकि उन्होंने यह नहीं बताया कि गवाहों के बयान क्यों दर्ज नहीं किए गए।

हाईकोर्ट के निर्देश

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज के आचरण की जांच आवश्यक है।

अदालत ने आदेश दिया कि मामले से संबंधित सभी आदेश-पत्र, जांच रिपोर्ट और ट्रायल जज द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजा जाए, ताकि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जा सके और यदि आवश्यक हो तो अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जा सके।

साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि इस मामले की जांच अब किसी अन्य सिविल जज को सौंपी जाए।

आगे की प्रक्रिया

हाईकोर्ट ने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, भिंड को निर्देश दिया कि वे किसी अन्य न्यायिक अधिकारी को यह जांच सौंपें।

अदालत ने कहा कि नई अदालत को चार महीने के भीतर जांच पूरी करनी होगी और पहले भेजी गई पीडब्ल्यूडी की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

यदि आवश्यक हो तो स्थानीय आयुक्त नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन निरीक्षण की तारीख तय करके ही जांच की जाए ताकि किसी भी पक्ष को यह शिकायत न रहे कि निरीक्षण उसकी अनुपस्थिति में किया गया।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने मामले में ट्रायल कोर्ट की लापरवाही को गंभीर मानते हुए संबंधित जज के आचरण की जांच के निर्देश दिए। साथ ही आदेश दिया कि मामले की जांच अब किसी अन्य सिविल जज द्वारा की जाएगी और रिपोर्ट चार महीने के भीतर पेश की जाएगी।

Case Title: Ashok Kumar & Others vs Smt. Meera Devi

Case No.: MCC No. 39 of 2022

Decision Date: 17 February 2026

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