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मद्रास हाई कोर्ट ने एरोड में 70 साल पुराने कब्रिस्तान को बहाल करने, कब्रें समतल करने पर कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए

के.एस. बालकृष्णन बनाम जिला कलेक्टर, इरोड और अन्य (क्लब्ड मैटर्स), मद्रास हाई कोर्ट ने एरोड के 70 साल पुराने कब्रिस्तान को संरक्षित करने का आदेश दिया, कब्रें समतल करने वालों पर कार्रवाई के निर्देश।

Vivek G.
मद्रास हाई कोर्ट ने एरोड में 70 साल पुराने कब्रिस्तान को बहाल करने, कब्रें समतल करने पर कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए

चेन्नई की अदालत में बुधवार को माहौल असामान्य रूप से गंभीर था। मुद्दा जमीन का था, लेकिन बहस सिर्फ रास्ते या वर्गीकरण तक सीमित नहीं रही - सवाल था मृतकों की गरिमा का।

मद्रास हाई कोर्ट की एकलपीठ, न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने एरोड जिले के करुमंडिसेल्लीपालयम टाउन पंचायत क्षेत्र में स्थित सर्वे नंबर 621/3 और 628/8 को लेकर दायर तीन याचिकाओं पर फैसला सुनाया।

अदालत ने साफ कहा - “जीवितों की तरह मृतकों को भी गरिमा का अधिकार है।”

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मामला क्या था?

विवाद इस बात पर था कि राजस्व रिकॉर्ड में ‘कार्ट ट्रैक पोरंबोके’ (ग्राम मार्ग) के रूप में दर्ज जमीन को क्या वास्तव में दशकों से कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है?

एक पक्ष का कहना था कि यह सिर्फ रास्ता है और इसे कब्रिस्तान घोषित करने की कोशिश गलत है। वहीं दूसरे पक्ष ने दावा किया कि यह 70 साल से अधिक समय से गांव का परंपरागत दफन स्थल है।

जिला कलेक्टर की जांच रिपोर्ट ने तस्वीर साफ कर दी। रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों सर्वे नंबरों के हिस्सों में लंबे समय से दफन और दाह संस्कार होते रहे हैं, और कई कब्रें हाल में मशीनों से समतल कर दी गईं ।

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कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने कहा, “महान धर्मों ने हमेशा मृतकों की गरिमा का सम्मान किया है। प्रतिद्वंद्विता के कारण कब्रों को नुकसान पहुंचाना अत्यंत चिंताजनक है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों की कानूनी स्थिति समझना जरूरी है। करुमंडिसेल्लीपालयम एक स्पेशल ग्रेड टाउन पंचायत है, जिस पर पंचायत अधिनियम नहीं बल्कि शहरी स्थानीय निकाय कानून लागू होता है।

पीठ ने कहा कि जब तक परिषद आधिकारिक रूप से किसी क्षेत्र में दाह संस्कार पर रोक का नोटिफिकेशन जारी नहीं करती, तब तक केवल आधुनिक श्मशान की उपलब्धता के आधार पर पारंपरिक स्थल के उपयोग को रोका नहीं जा सकता।

कोर्ट ने वर्ष 2000 में पारित टाउन पंचायत के प्रस्ताव और उसके बाद बनाई गई “सेमेट्री रोड” का हवाला दिया। इससे यह साबित हुआ कि पंचायत स्वयं उस क्षेत्र को कब्रिस्तान मानकर वहां सड़क और सुविधाएं विकसित कर चुकी थी ।

न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड, नक्शे और फोटो इस बात की पुष्टि करते हैं कि कम से कम वर्ष 2000 से यह स्थल दफन स्थल के रूप में उपयोग हो रहा है।

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दलित समुदाय की कब्रों का मामला

जिला रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अनुसूचित जाति समुदाय के लोग विशेष हिस्से में दफन करते थे और वहां ‘माला मंदिर’ स्थित है ।

अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कब्रों को समतल किया गया है, तो यह न केवल आपराधिक कृत्य हो सकता है बल्कि अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत भी कार्रवाई बनती है।

अदालत का फैसला

तीनों याचिकाओं में से डॉक्टर टी.एस. चेल्लाकुमारस्वामी की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

अदालत ने निर्देश दिए:

  1. जिला कलेक्टर यह सुनिश्चित करें कि कब्रिस्तान क्षेत्र को स्पष्ट रूप से चिन्हित कर बाड़बंदी की जाए।
  2. टाउन पंचायत क्षेत्र को अतिक्रमण और कचरा फेंकने से मुक्त रखे।
  3. 14 अक्टूबर 2025 के पंचायत प्रस्ताव पर तत्काल कार्रवाई कर राजस्व रिकॉर्ड में उचित संशोधन किया जाए।
  4. कब्रों को समतल करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जाए।

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बाकी दो याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा - “मृतकों को भी सम्मानजनक विश्राम का अधिकार है। प्रशासन का कर्तव्य है कि वह इसे सुनिश्चित करे।”

Case Title: K.S. Balakrishnan vs District Collector, Erode & Ors (Clubbed Matters)

Case No.: W.P.Nos.36402, 37501 & 44377 of 2025

Decision Date: 11 February 2026

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