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ओडिशा हाईकोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, कहा-नाबालिग से अपराध को शादी से वैध नहीं बनाया जा सकता

सनत कुमार प्रधान बनाम ओडिशा राज्य, ओडिशा हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी की 20 साल की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा नाबालिग से अपराध को बाद की शादी से वैध नहीं बनाया जा सकता।

Vivek G.
ओडिशा हाईकोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, कहा-नाबालिग से अपराध को शादी से वैध नहीं बनाया जा सकता

ओडिशा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि नाबालिग के साथ यौन अपराध को बाद में हुई शादी के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि अपराध उस समय हुआ जब पीड़िता नाबालिग थी, तो बाद की सामाजिक या पारिवारिक व्यवस्था उसे कानूनी रूप से वैध नहीं बना सकती।

यह टिप्पणी करते हुए अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, जुलाई 2016 में जब पीड़िता लगभग 17 वर्ष की थी, तब आरोपी सनत कुमार प्रधान उसके घर आया और उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए। घटना के बाद आरोपी ने उसे धमकी दी कि वह किसी को इस बारे में न बताए।

बाद में पीड़िता ने यह बात अपनी मां को बताई। परिवार और गांव के लोगों की बैठक हुई, जहां आरोप है कि आरोपी ने घटना स्वीकार की और यह तय हुआ कि पीड़िता के बालिग होने के बाद दोनों की शादी कर दी जाएगी।

कुछ वर्षों बाद, मई 2021 में दोनों की शादी हुई। हालांकि शादी के लगभग 10–15 दिन बाद आरोपी घर छोड़कर चला गया और पीड़िता से संपर्क नहीं रखा। बाद में पीड़िता ने आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने भी उसके साथ दुर्व्यवहार किया और उसे जान से मारने की कोशिश की।

आखिरकार 30 जनवरी 2024 को पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई।

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ट्रायल कोर्ट का फैसला

कंधमाल के फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए आरोपी को POCSO Act की धारा 6(1) और IPC की धारा 376(2)(n) के तहत दोषी ठहराया।

अदालत ने आरोपी को 20 साल की कठोर कारावास और ₹20,000 जुर्माना की सजा सुनाई। साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से पीड़िता को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।

हालांकि साक्ष्य के अभाव में सह-आरोपी माता-पिता को धारा 498A और 506 IPC के आरोपों से बरी कर दिया गया।

हाईकोर्ट में आरोपी की दलीलें

अपील में आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। उसका कहना था कि:

  • एफआईआर लगभग आठ साल की देरी से दर्ज हुई, जिससे आरोपों पर संदेह पैदा होता है।
  • मेडिकल रिपोर्ट से बलात्कार की पुष्टि नहीं होती।
  • पीड़िता और आरोपी के बीच बाद में शादी होना यह दर्शाता है कि संबंध सहमति से थे।
  • पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए केवल स्कूल रजिस्टर पर भरोसा किया गया, जबकि अन्य दस्तावेज एकत्र नहीं किए गए।

आरोपी ने यह भी तर्क दिया कि कुछ महत्वपूर्ण गवाहों को अदालत में पेश नहीं किया गया।

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अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

न्यायमूर्ति डॉ. संजीब के. पाणिग्रही की एकल पीठ ने मामले की पूरी सामग्री की पुनः जांच की और कहा कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही स्वयं में पर्याप्त हो सकती है।

अदालत ने कहा:

“यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद और सुसंगत हो, तो केवल उसी आधार पर दोषसिद्धि संभव है।”

अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में एफआईआर में देरी अपने आप में मुकदमे को कमजोर नहीं करती, खासकर जब परिवार सामाजिक दबाव या समझौते के प्रयासों के कारण तुरंत शिकायत दर्ज नहीं कराता।

पंचायत समझौते पर सख्त टिप्पणी

फैसले में अदालत ने गांव की बैठक और समझौते की कोशिशों पर कड़ी टिप्पणी की।

अदालत ने कहा:

“किसी नाबालिग के साथ यौन अपराध का मामला गांव की बैठक में ‘समझौते’ से तय नहीं किया जा सकता। यह कानून का विषय है और पुलिस को रिपोर्ट करना अनिवार्य है।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में हुई शादी अपराध को कानूनी रूप से खत्म नहीं कर सकती।

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हाईकोर्ट का निर्णय

सभी साक्ष्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय उचित और कानून के अनुरूप है।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं और इसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

अंततः अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।

Case Title: Sanat Kumar Pradhan v. State of Odisha

Case No.: CRLA No. 1145 of 2025

Decision Date: 13 February 2026

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