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एक FIR या हजारों? सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों से ठगी मामलों में FIR क्लबिंग पर बड़ा फैसला सुनाया

राज्य (एनसीटी ऑफ़ दिल्ली) बनाम खिमजी भाई जडेजा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: निवेशकों से ठगी मामलों में एक FIR या कई FIR-कब होगी क्लबिंग, अदालत ने कानून साफ किया।

Vivek G.
एक FIR या हजारों? सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों से ठगी मामलों में FIR क्लबिंग पर बड़ा फैसला सुनाया

नई दिल्ली की अदालत संख्या में मंगलवार को सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर था। सवाल सीधा लेकिन असर दूरगामी-क्या हजारों निवेशकों से एक जैसी ठगी होने पर हर निवेश के लिए अलग FIR जरूरी है, या एक ही FIR में पूरा मामला समेटा जा सकता है? इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना अहम फैसला सुनाया, जिसने पुलिस जांच और ट्रायल की दिशा साफ कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज FIR नंबर 89/2009 से जुड़ा है। शिकायत थी कि आरोपियों ने देवी की कृपा से पैसा “तीन गुना” करने का झांसा देकर लोगों से निवेश कराया। जांच में सामने आया कि 1,852 निवेशकों से करीब ₹46.40 करोड़ की ठगी हुई।

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दिल्ली पुलिस ने एक FIR दर्ज कर बाकी शिकायतों को उसी जांच में जोड़ दिया और अन्य पीड़ितों को गवाह माना। इसी दौरान ट्रायल कोर्ट ने कुछ कानूनी सवाल उठाए और उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट के पास संदर्भ (रेफरेंस) के तौर पर भेज दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा था कि हर निवेश एक अलग लेनदेन है, इसलिए हर शिकायत पर अलग FIR होनी चाहिए। बेंच का मानना था कि सभी शिकायतों को एक FIR में मिलाने से पीड़ितों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, खासकर तब जब पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करे।

राज्य सरकार इस निष्कर्ष से सहमत नहीं थी और उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि अगर एक ही साजिश के तहत लोगों से ठगी की गई है, तो उसे “एक ही लेनदेन” माना जाना चाहिए। अदालत की मदद के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया।

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पीठ ने कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यह देखने की जरूरत है कि क्या सभी कृत्य एक ही साजिश और उद्देश्य से जुड़े हैं। अदालत ने टिप्पणी की,

“अगर आरोप एक आपराधिक साजिश के तहत हैं और कार्रवाई में निरंतरता दिखती है, तो एक FIR दर्ज करना कानूनन गलत नहीं है।”

अदालत ने साफ किया कि यह तय करने के लिए तीन बातों पर गौर किया जाता है-

  1. उद्देश्य की एकता
  2. समय और स्थान की नजदीकी
  3. कार्रवाई की निरंतरता

इन सभी का एक साथ होना जरूरी नहीं, लेकिन अगर साजिश एक है और ठगी उसी के तहत हुई है, तो मामला एक FIR में चल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से पलटते हुए कहा कि इस मामले में एक FIR दर्ज करना और अन्य शिकायतों को उसी जांच का हिस्सा बनाना सही था। अदालत ने हाई कोर्ट द्वारा दिए गए पहले दो सवालों के जवाब रद्द कर दिए।

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पीठ ने कहा कि अब यह ट्रायल कोर्ट पर निर्भर करेगा कि जांच के आधार पर तय करे कि सभी घटनाएं एक ही लेनदेन का हिस्सा हैं या नहीं। अगर ऐसा पाया गया, तो एक ही ट्रायल में मुकदमा चल सकता है।

अदालत ने यह भी जोड़ा कि अगर किसी स्तर पर पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करती है या आरोपियों को राहत मिलती है, तो अन्य पीड़ित प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने के हकदार होंगे।

Case Title: State (NCT of Delhi) vs. Khimji Bhai Jadeja

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 9198 of 2019

Decision Date: 6 January 2026

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