सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर नियमों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रम (PSU) कर्मचारियों के बच्चों के बीच अलग-अलग मानदंड अपनाना संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है।
न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा की पीठ ने केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि OBC क्रीमी लेयर तय करने के लिए 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम को ही लागू माना जाएगा।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उन उम्मीदवारों से जुड़ा था जिन्होंने विभिन्न वर्षों में सिविल सेवा परीक्षा (CSE) पास की थी और OBC (नॉन-क्रीमी लेयर) श्रेणी में चयन का दावा किया था।
केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने उनके माता-पिता की सैलरी को आय मानते हुए उन्हें क्रीमी लेयर में रखा और OBC आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया।
उम्मीदवारों ने इस फैसले को चुनौती देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और बाद में विभिन्न हाईकोर्टों का दरवाजा खटखटाया।
मद्रास, दिल्ली और केरल हाईकोर्ट ने उम्मीदवारों के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि केवल PSU में नौकरी होने के आधार पर क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती। इन फैसलों को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
मुख्य कानूनी सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने दो प्रमुख प्रश्न थे:
- क्या 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 8 सितंबर 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम से ऊपर माना जा सकता है?
- क्या सरकारी कर्मचारियों और PSU/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग मानदंड रखना संवैधानिक है?
अदालत की टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण नीति का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को अवसर देना है, लेकिन क्रीमी लेयर का सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचे।
पीठ ने कहा कि 1993 का ऑफिस मेमोरेंडम स्पष्ट रूप से बताता है कि आय परीक्षण (Income/Wealth Test) में सैलरी और कृषि आय को शामिल नहीं किया जाएगा।
अदालत ने यह भी कहा कि 2004 का स्पष्टीकरण पत्र इस मूल व्यवस्था को बदल नहीं सकता।
पीठ ने कहा:
“समान परिस्थिति में काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों और PSU कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग व्यवहार करना समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा।”
अदालत के अनुसार, यदि सरकार अभी तक PSU पदों की सरकारी पदों से समानता तय नहीं कर पाई है, तो इसका नुकसान उम्मीदवारों को नहीं उठाना चाहिए।
भेदभाव पर कोर्ट की राय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि सरकारी कर्मचारियों की सैलरी क्रीमी लेयर निर्धारण में शामिल नहीं की जाती, लेकिन PSU कर्मचारियों के मामले में उसे शामिल किया जाता है, तो यह “hostile discrimination” यानी असंवैधानिक भेदभाव होगा।
अदालत ने कहा कि समान वर्ग के लोगों के साथ अलग व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है।
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अदालत का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सभी अपीलें खारिज कर दीं।
अदालत ने निर्देश दिया कि:
- संबंधित उम्मीदवारों और अन्य समान मामलों को इस निर्णय के सिद्धांतों के अनुसार दोबारा देखा जाए।
- केंद्र सरकार छह महीने के भीतर उनकी दावेदारी पर फैसला करे।
- जरूरत पड़ने पर योग्य उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए सुपरन्यूमेरेरी पद (अतिरिक्त पद) भी बनाए जा सकते हैं।
Case Title: Union of India & Others v. Rohith Nathan & Others
Case No.: Civil Appeal Nos. 2827–2829 of 2018 (with connected matters)
Decision Date: 11 March 2026









