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सुप्रीम कोर्ट ने 100 साल पुराने अमोगसिद्धा मंदिर पुजारी विवाद में वादी परिवार के हक में फैसला सुनाया

ओगेप्पा (डी) एलआरएस और अन्य के माध्यम से बनाम साहेबगौड़ा (डी) एलआरएस और अन्य के माध्यम से। सुप्रीम कोर्ट ने अमोगसिद्धा मंदिर पुजारी अधिकार विवाद में वादी परिवार को पैतृक वहीवटदार पुजारी माना, 100 साल पुराने मामले में अपील खारिज।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने 100 साल पुराने अमोगसिद्धा मंदिर पुजारी विवाद में वादी परिवार के हक में फैसला सुनाया

करीब एक सदी से चल रहे अमोगसिद्धा मंदिर के पुजारी अधिकार विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम मुहर लगा दी। अदालत ने कर्नाटक के बीजापुर स्थित मंदिर में पुजारी और ‘वहीवटदार’ (प्रबंधन अधिकार) को लेकर चल रहे लंबे कानूनी संघर्ष में वादी परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया और प्रतिवादियों की अपील खारिज कर दी।

यह मामला केवल धार्मिक अनुष्ठानों का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे अधिकार और प्रतिष्ठा का भी था।

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मामले की पृष्ठभूमि

विवाद अमोगसिद्धा संत की समाधि वाले मंदिर से जुड़ा है, जो कर्नाटक के ममत्तीगुड्डा, जालगेरी क्षेत्र में स्थित है। वादी पक्ष का दावा था कि वे इस मंदिर के पैतृक पुजारी हैं और पीढ़ियों से पूजा, जत्रा (वार्षिक मेला) और चढ़ावे का प्रबंधन करते आए हैं।

रिकॉर्ड के अनुसार, यह विवाद 1901 से अदालतों में आता-जाता रहा। 1944 में प्रतिवादी पक्ष के पूर्वजों ने मंदिर के कब्जे और पुजारी अधिकार को लेकर मुकदमा दायर किया था। वह मुकदमा खारिज हो गया, और बाद में अपील के दौरान उसे वापस ले लिया गया।

इसके बाद 1982 में वादी पक्ष ने सिविल सूट दायर कर खुद को पैतृक पुजारी घोषित करने और स्थायी निषेधाज्ञा (स्थायी रोक आदेश) की मांग की।

ट्रायल कोर्ट ने आंशिक रूप से दोनों पक्षों को पूजा का अधिकार दिया, लेकिन अपीलीय अदालत ने स्पष्ट रूप से वादी परिवार को ही पैतृक पुजारी माना।

मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां पहले तकनीकी आधार पर अपील स्वीकार हुई, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे मेरिट (तथ्यों) के आधार पर दोबारा सुनवाई के लिए लौटाया। दोबारा सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने वादी परिवार के पक्ष में फैसला दिया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए यह अपील सुप्रीम कोर्ट आई थी।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट तथ्यों के समान निष्कर्षों में दखल देने से आम तौर पर बचती है।

पीठ ने कहा, “जब निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने एक जैसे निष्कर्ष निकाले हैं, तो इस न्यायालय को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक फैसला स्पष्ट रूप से गलत या विकृत न हो।”

अदालत ने यह भी गौर किया कि प्रतिवादी पक्ष 1901 के एक पुराने डिक्री (फैसले) पर निर्भर था, लेकिन 1944 में उसी पक्ष ने मंदिर के कब्जे के लिए नया मुकदमा दायर किया था।

पीठ ने टिप्पणी की, “यदि वे पहले से कब्जे और पुजारी अधिकार में थे, तो फिर 1944 में कब्जा मांगने का मुकदमा क्यों दायर किया गया?”

अदालत ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य माना कि 1944 का मुकदमा वापस लेने के बाद करीब 36 वर्षों तक कोई नया दावा नहीं किया गया।

न्यायालय ने कहा, “इतने लंबे समय तक नया मुकदमा न दायर करना यह दर्शाता है कि पक्ष ने जमीनी हकीकत को स्वीकार कर लिया था।”

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साक्ष्यों पर विचार

हाईकोर्ट की तरह सुप्रीम कोर्ट ने भी राजस्व रिकॉर्ड (भूमि अभिलेख) पर ध्यान दिया। रिकॉर्ड में मंदिर सेवा के बदले दी गई जमीन पर वादी परिवार के पूर्वजों के नाम दर्ज थे।

अदालत ने प्रतिवादी गवाह के बयान को भी महत्वपूर्ण माना, जिसमें उसने स्वीकार किया कि संबंधित जमीन वादी पक्ष द्वारा ही जोती जा रही थी।

पीठ ने स्पष्ट किया, “केवल पुराने डिक्री का हवाला देना पर्याप्त नहीं है। अधिकार का दावा करने वाले को यह भी बताना होगा कि वह कब और कैसे कब्जे में आया।”

अदालत ने पाया कि प्रतिवादी पक्ष की लिखित दलीलों में कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख ही नहीं था। ऐसे में केवल मौखिक गवाही से मामला मजबूत नहीं हो सकता।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वादी परिवार ने दस्तावेजी साक्ष्य, राजस्व रिकॉर्ड और गवाहों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि वे ही अमोगसिद्धा मंदिर के पैतृक वहीवटदार पुजारी हैं।

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या विकृति नहीं है।

इसी आधार पर अदालत ने दोनों सिविल अपीलों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।

कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर लागत (कॉस्ट) नहीं लगाई।

Case Title: Ogeppa (D) through LRs & Ors. vs Sahebgouda (D) through LRs & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 7181–7182 of 2016

Decision Date: 25 February 2026

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