सुप्रीम कोर्ट ने बैंक की वसूली कार्यवाही से जुड़ी एक लंबे समय से चल रही संपत्ति नीलामी विवाद में मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए दायर सिविल अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि यदि संपत्ति के मूल्यांकन को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं तो अदालत यह जांच कर सकती है कि नीलामी प्रक्रिया में संपत्ति की सही कीमत तय की गई थी या नहीं।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा मामले को सीमित मुद्दे-संपत्तियों के मूल्यांकन-के लिए डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) को वापस भेजना न्यायसंगत था।
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मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब एक कंपनी ने बैंक से प्राप्त सुविधा के तहत चेक जारी किए, लेकिन खाते में पर्याप्त धनराशि नहीं होने के कारण भुगतान में लगातार कमी आने लगी। बैंक ने इस कमी को सुरक्षित करने के लिए गारंटरों से कई संपत्तियों के शीर्षक दस्तावेज जमा कराकर इक्विटेबल मॉर्गेज बनवाया।
बाद में बकाया राशि की वसूली के लिए बैंक ने 1998 में चेन्नई के डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल में आवेदन दाखिल किया। ट्रिब्यूनल ने बैंक के पक्ष में आदेश देते हुए लगभग 45 लाख रुपये से अधिक की वसूली का आदेश दिया और इसके आधार पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया।
जब उधारकर्ताओं ने भुगतान नहीं किया, तो ट्रिब्यूनल ने 2010 में संपत्तियों को अटैच कर नीलामी की प्रक्रिया शुरू की। उसी वर्ष अक्टूबर में सार्वजनिक नीलामी हुई, जिसमें अपीलकर्ता सबसे अधिक बोली लगाने वाला निकला और लगभग 2.10 करोड़ रुपये की बोली लगाई। बाद में पूरी राशि जमा करने पर जनवरी 2011 में बिक्री की पुष्टि कर दी गई और बिक्री प्रमाणपत्र जारी हुआ।
गारंटरों ने ट्रिब्यूनल के आदेश को डेब्ट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल (DRAT) में चुनौती दी। अपीलेट ट्रिब्यूनल ने नीलामी प्रक्रिया को वैध मानते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि बकायेदार अपने आंतरिक विवादों का लाभ उठाकर वसूली प्रक्रिया को बाधित नहीं कर सकते।
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इसके बाद गारंटरों ने मद्रास हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने नीलामी और बैंक की वसूली की प्रक्रिया को सही माना, लेकिन यह भी कहा कि संबंधित संपत्तियों के मूल्यांकन के मुद्दे की फिर से जांच की जानी चाहिए।
नीलामी में सफल बोलीदाता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर कहा कि नीलामी की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और बिक्री की पुष्टि भी हो चुकी है। ऐसे में लगभग दस साल बाद संपत्तियों के मूल्यांकन की दोबारा जांच का आदेश देना उचित नहीं है।
उसका कहना था कि वह एक “बोना फाइड” (ईमानदार) तीसरा पक्ष खरीदार है और अदालतों के फैसलों के अनुसार ऐसे खरीदार के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि नीलामी प्रक्रिया में कई कानूनी खामियां थीं और खरीदार ने नीलामी की शर्तों का पूरी तरह पालन नहीं किया, इसलिए उसे संपत्ति पर कोई वैध अधिकार नहीं मिल सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सही है कि अदालत द्वारा पुष्टि की गई नीलामी को सामान्यतः आसानी से नहीं बदला जाता, खासकर तब जब खरीदार एक स्वतंत्र तीसरा पक्ष हो।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सुरक्षा पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। यदि संपत्ति के मूल्यांकन या रिजर्व प्राइस तय करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो अदालत उस पहलू की जांच कर सकती है।
पीठ ने कहा:
“नीलामी का उद्देश्य संपत्ति के लिए सर्वोत्तम संभव कीमत प्राप्त करना है और यह सुनिश्चित करना है कि प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष हो।”
अदालत ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने नीलामी को रद्द नहीं किया बल्कि केवल मूल्यांकन के मुद्दे की जांच के लिए मामला DRT को वापस भेजा है, जो एक सीमित और संतुलित आदेश है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का संतुलित उपयोग किया है।
अदालत ने कहा कि संपत्तियों के मूल्यांकन की दोबारा जांच के लिए मामला DRT को भेजना कानूनी रूप से गलत नहीं है और इससे नीलामी प्रक्रिया स्वतः निरस्त नहीं होती।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
Case Title: Om Sakthi Sekar v. V. Sukumar & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 3362 of 2026 (Arising out of SLP (C) No. 2122 of 2022)
Decision Date: 13 March 2026










