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निजी शिकायत पर कंपनी धोखाधड़ी का मामला नहीं चलेगा? सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

येरराम विजय कुमार बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य। सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कंपनी धोखाधड़ी के मामलों में निजी शिकायत पर संज्ञान नहीं, IPC आरोप अलग अदालत में चलेंगे।

Vivek G.
निजी शिकायत पर कंपनी धोखाधड़ी का मामला नहीं चलेगा? सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की अदालत में शुक्रवार को सुनवाई के दौरान एक अहम सवाल पर स्पष्ट जवाब मिला-क्या कंपनी अधिनियम से जुड़े गंभीर धोखाधड़ी मामलों में निजी व्यक्ति की शिकायत पर सीधे आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सकती है? न्यायालय ने इस मुद्दे पर हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए। यह फैसला कॉरपोरेट विवादों में आपराधिक कानून के इस्तेमाल को लेकर बड़ी मिसाल माना जा रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला तेलंगाना की एक रियल एस्टेट कंपनी श्रीमुख नमिता होम्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी के प्रमोटरों और बाद में शामिल किए गए निदेशकों के बीच प्रबंधन और नियंत्रण को लेकर विवाद शुरू हुआ।

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आरोप है कि निदेशक पद से हटाए जाने के बाद कुछ व्यक्तियों ने बिना अधिकार असाधारण आम बैठक बुलाकर नए निदेशकों की नियुक्ति की और कॉरपोरेट दस्तावेजों में गलत जानकारियां दाखिल कीं। इन्हीं आरोपों के आधार पर विशेष आर्थिक अपराध अदालत में निजी शिकायत दाखिल की गई थी।

तेलंगाना हाईकोर्ट की एकल पीठ ने आरोपों को गंभीर मानते हुए कहा था कि यह शुरुआती स्तर पर जांच का विषय है और इसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत खारिज नहीं किया जा सकता। इसके बाद आरोपी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

दो सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कंपनी अधिनियम की धाराओं की बारीकी से व्याख्या की।

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अदालत ने कहा,

“धारा 448 के तहत झूठे बयान का अपराध, सजा के लिए सीधे तौर पर धारा 447 (धोखाधड़ी) से जुड़ा है। ऐसे मामलों में कानून ने स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान तय किए हैं।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि कंपनी अधिनियम की धारा 212(6) के तहत धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में संज्ञान तभी लिया जा सकता है, जब शिकायत सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) या केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी की ओर से हो। निजी शिकायत इस कानूनी बाधा को पार नहीं कर सकती।

अदालत ने कहा कि धारा 448 (झूठा बयान) अपने आप में सजा नहीं देती, बल्कि उसकी सजा धारा 447 से जुड़ी है। इसलिए,

“धारा 447 के बिना धारा 448 पर संज्ञान लेना कानून के उद्देश्य के खिलाफ होगा।”

इसी तर्क के आधार पर धारा 451 (बार-बार उल्लंघन) के तहत भी कार्यवाही को अस्थिर माना गया।

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम की धाराओं के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया, लेकिन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं-जैसे धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश-पर रोक नहीं लगाई।
अदालत ने साफ कहा,

“सिर्फ दीवानी या कॉरपोरेट विवाद लंबित होने से आपराधिक आरोप स्वतः समाप्त नहीं हो जाते।”

IPC के आरोप अब उपयुक्त क्षेत्राधिकार वाली सामान्य अदालत में सुने जाएंगे।

अंतिम फैसला

Supreme Court of India ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि:

  • कंपनी अधिनियम की धारा 448 और 451 के तहत दर्ज शिकायत और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही रद्द की जाती है।
  • IPC की धाराओं से जुड़ा मामला विशेष अदालत से स्थानांतरित कर क्षेत्राधिकार वाली अदालत में भेजा जाएगा।
  • यह स्थानांतरण चार सप्ताह के भीतर किया जाएगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि IPC मामलों पर आगे की सुनवाई बिना किसी पूर्व टिप्पणी के, अपने गुण-दोष के आधार पर होगी।

Case Title: Yerram Vijay Kumar vs State of Telangana & Ors.

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 11530 of 2024

Decision Date: 9 January 2026

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