जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जम्मू नगर निगम (JMC) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए एक इमारत की सुरक्षा जांच दोबारा कराने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि जब कोर्ट के निर्देश पर इंजीनियरों की समिति पहले ही इमारत को सुरक्षित घोषित कर चुकी है, तो प्रशासन उसी मुद्दे को दोबारा खोल नहीं सकता।
न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल की एकल पीठ ने यह भी कहा कि किसी तकनीकी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को बिना उचित कारण के नजरअंदाज करना कानून के खिलाफ है।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता कई दशकों से जम्मू के एक्सचेंज रोड स्थित एक इमारत में दुकानों में व्यवसाय चला रहे थे। यह दुकानें उनके लिए आजीविका का मुख्य स्रोत थीं।
मामला तब शुरू हुआ जब मकान मालिकों ने नगर निगम के सामने आवेदन देकर इमारत को असुरक्षित घोषित करने की मांग की। इसके बाद सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) की एक रिपोर्ट में इमारत को असुरक्षित बताया गया। उसी आधार पर नगर निगम ने नोटिस जारी कर भवन को गिराने या मरम्मत करने का निर्देश दिया।
दुकानदारों ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत के निर्देश पर इंजीनियरों की एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई, जिसने मौके का निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट में अधिकांश दुकानों को सुरक्षित बताया। केवल एक दुकान में मामूली मरम्मत की जरूरत बताई गई।
विवाद कैसे बढ़ा
कोर्ट द्वारा पहले पारित आदेश के अनुसार नगर निगम को इंजीनियरिंग रिपोर्ट के आधार पर मामला पुनर्विचार करना था।
लेकिन नगर निगम आयुक्त ने इसके बजाय एक निजी पैनल फर्म से फिर से सुरक्षा ऑडिट कराने का आदेश जारी कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने इसे अदालत के आदेश की अवहेलना बताते हुए चुनौती दी।
अदालत की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार अदालत के निर्देश पर विशेषज्ञ समिति जांच कर चुकी हो और उसकी रिपोर्ट रिकॉर्ड पर हो, तो प्रशासन को उसी के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
पीठ ने कहा, “जब किसी सक्षम अदालत के आदेश पर विशेषज्ञ समिति रिपोर्ट दे चुकी है, तो प्रशासनिक प्राधिकरण उस निष्कर्ष को अनदेखा कर नया जांच आदेश नहीं दे सकता।”
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भवन की संरचनात्मक सुरक्षा जैसे तकनीकी मामलों में न्यायालय या प्रशासन को विशेषज्ञों की राय का सम्मान करना चाहिए।
पीठ ने कहा कि बिना कारण के रिपोर्ट को खारिज करना और नया ऑडिट कराना न्यायिक आदेश की अवहेलना के समान है।
आजीविका पर प्रभाव पर कोर्ट की चिंता
अदालत ने यह भी नोट किया कि दुकानदारों की रोजी-रोटी इन दुकानों पर निर्भर है और लगभग दो वर्षों से दुकानें बंद रहने से उन्हें आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी।
पीठ ने टिप्पणी की कि यदि किसी इमारत को जानबूझकर असुरक्षित घोषित कराकर किरायेदारों को निकालने की कोशिश की गई है, तो यह कानून के दुरुपयोग का मामला हो सकता है।
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अदालत का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने 26 जुलाई 2025 के नगर निगम आयुक्त के आदेश को रद्द कर दिया।
साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि जिन दुकानों को इंजीनियरिंग समिति ने सुरक्षित घोषित किया है, उनमें दुकानदारों को तुरंत वापस काम शुरू करने दिया जाए।
जहां एक दुकान में मरम्मत की जरूरत बताई गई है, वहां भवन मालिकों को तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार मरम्मत कराने का निर्देश दिया गया।
इसके अलावा अदालत ने मुख्य सचिव, जम्मू-कश्मीर को निर्देश दिया कि शुरुआती “असुरक्षित” रिपोर्ट कैसे बनी इसकी जांच के लिए स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाए।
यदि जांच में किसी अधिकारी की गलती सामने आती है, तो उसे दुकानदारों को मुआवजे के रूप में व्यक्तिगत रूप से भुगतान करना होगा।
Case Title: Anoop Uppal & Others vs Jammu Municipal Corporation & Others
Case No.: WP(C) No. 2153/2025 (with connected matters)
Decision Date: 05 March 2026










