तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कोई सुरक्षा बल का कर्मचारी प्रशिक्षण के दौरान लापता हो जाए और वर्षों तक उसका कोई पता न चले, तो उसे सिर्फ अनुपस्थित मानकर सेवा से हटाना उचित नहीं है। अदालत ने CRPF के एक जवान को “डेज़र्टर” घोषित कर सेवा से हटाने का आदेश रद्द करते हुए उसके परिवार को सेवा व पेंशन संबंधी लाभ देने का निर्देश दिया।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति जी.एम. मोहिउद्दीन की खंडपीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता एम. अप्पा राव ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। वे CRPF कांस्टेबल एम. श्रीकांत के पिता हैं, जो 2015 से लापता हैं।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, श्रीकांत का बायां पैर कट जाने के कारण मेडिकल बोर्ड ने उन्हें कॉम्बैट ड्यूटी के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके बाद पुनर्वास कार्यक्रम के तहत उन्हें कंप्यूटर प्रशिक्षण के लिए नई दिल्ली भेजा गया था।
फरवरी 2015 में वे CRPF के झरोदा कलां स्थित ग्रुप सेंटर में प्रशिक्षण के लिए पहुंचे। लेकिन 1 जून 2015 को वे अचानक कैंप से गायब पाए गए। इसके बाद CRPF अधिकारियों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और उनकी तलाश की गई, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल सका।
बाद में विभाग ने उन्हें “डेज़र्टर” घोषित करते हुए 2017 में एकतरफा विभागीय कार्रवाई के आधार पर सेवा से हटा दिया।
हाईकोर्ट के सामने दो प्रमुख सवाल थे-
- क्या लापता कर्मचारी के खिलाफ एकतरफा विभागीय जांच के आधार पर सेवा से हटाने का आदेश वैध है?
- क्या परिवार द्वारा अलग से गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज न कराने के आधार पर सेवा लाभ देने से इनकार किया जा सकता है?
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खंडपीठ ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि श्रीकांत उस समय प्रशिक्षण केंद्र में थे और पूरी तरह CRPF के नियंत्रण में थे। ऐसे में उनके अचानक लापता होने की जिम्मेदारी से विभाग पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि वह वास्तव में फरार हुआ था।
बेंच ने टिप्पणी की, “जब कर्मचारी प्रशिक्षण के दौरान बल के नियंत्रण में था और वर्षों तक उसका कोई पता नहीं चला, तो सिर्फ एकतरफा विभागीय कार्रवाई के आधार पर उसे सेवा से हटाना उचित नहीं ठहराया जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि विभाग ने उस समय के रिकॉर्ड और CCTV फुटेज सुरक्षित नहीं रखे, जबकि उसी घटना को लेकर पुलिस शिकायत भी दर्ज कराई गई थी।
CRPF ने अदालत में तर्क दिया था कि परिवार ने अपने इलाके में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई, इसलिए लाभ नहीं दिए जा सकते।
इस पर अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब कर्मचारी प्रशिक्षण के दौरान बल की निगरानी में लापता हुआ, तब परिवार पर अलग से FIR दर्ज कराने की बाध्यता नहीं डाली जा सकती।
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अदालत ने 2017 का सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने CRPF अधिकारियों को निर्देश दिया कि श्रीकांत को 2015 से लापता मानते हुए उनके वैधानिक सेवा और पेंशन संबंधी लाभों की प्रक्रिया शुरू की जाए।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह भुगतान संबंधित नियमों के अनुसार उनके वैध उत्तराधिकारियों या नामित व्यक्तियों को किया जाएगा और इसके लिए आवश्यक इंडेम्निटी बॉन्ड लिया जा सकता है।
अंततः अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए मामले का निपटारा कर दिया।
Case Title: Shri M. Appa Rao vs Union of India & Others
Case No.: Writ Petition No. 15719 of 2021
Decision Date: 19 January 2026









