छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार विवाह करता है और वही परंपराएं अपनाता है, तो उस पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act) लागू हो सकता है।
डिवीजन बेंच ने इस आधार पर फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पति के अनुसूचित जनजाति से होने के कारण आपसी सहमति से तलाक (Section 13B) की याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना गया था।
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मामले की पृष्ठभूमि
मामले में पत्नी स्म्त. गुड़िया नागेश अनुसूचित जाति से हैं, जबकि पति मुनिराज मांडवी अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं। दोनों का विवाह 15 अप्रैल 2009 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था, जिसमें सप्तपदी की रस्म भी निभाई गई थी।
दंपति का एक पुत्र भी है, जो पत्नी के साथ रह रहा है। कुछ वर्षों बाद, 6 अप्रैल 2014 से दोनों अलग-अलग रहने लगे।
इसके बाद दोनों ने आपसी सहमति से तलाक के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की।
हालांकि, जगदलपुर स्थित फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार यह कानून अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता।
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अपील में उठे मुख्य तर्क
अपीलकर्ताओं के वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पति-पत्नी दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उनका विवाह हिंदू परंपराओं के अनुसार हुआ था और वे उसी परंपरा का पालन करते हैं।
वकील ने तर्क दिया कि जब पक्षकार स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि वे हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, तो फैमिली कोर्ट को केवल इस आधार पर याचिका खारिज नहीं करनी चाहिए थी कि पति अनुसूचित जनजाति से है।
सुनवाई के दौरान अदालत की सहायता के लिए नियुक्त अमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) ने भी यही तर्क रखा कि यदि जनजाति का सदस्य स्वेच्छा से हिंदू परंपराओं को अपनाता है, तो उसे हिंदू कानून के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
अदालत की कानूनी व्याख्या
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को उनके पारंपरिक कानूनों की सुरक्षा देने के लिए बनाई गई है।
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बेंच ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान बहिष्कार के लिए नहीं बल्कि संरक्षण के लिए है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Labishwar Manjhi बनाम Pran Manjhi का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि यदि जनजाति के लोग व्यवहार में हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन पर हिंदू कानून लागू हो सकता है।
बेंच ने कहा:
“यदि किसी जनजाति का सदस्य स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज, परंपरा और संस्कार अपनाता है, तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लेने से रोका नहीं जा सकता।”
अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था और सप्तपदी की रस्म भी निभाई गई थी, जो हिंदू विवाह की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है।
कोर्ट का निर्णय
सभी तथ्यों और कानून की व्याख्या पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला गलत ठहराया।
बेंच ने कहा कि जब पति-पत्नी दोनों स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि वे हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं, तो उनकी धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका सुनवाई योग्य है।
अंततः अदालत ने:
- फैमिली कोर्ट का 12 अगस्त 2025 का आदेश रद्द कर दिया।
- मामले को फिर से फैमिली कोर्ट को भेज दिया, ताकि वह आपसी सहमति से तलाक की याचिका पर कानून के अनुसार निर्णय करे।
Case Title: Smt. Gudiya Nagesh & Anr. v. State / Family Court Bastar (Appeal)
Case No.: FA(MAT) No. 344 of 2025
Decision Date: 3 March 2026










