सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल आपराधिक मामले में बरी होना किसी उम्मीदवार को पुलिस सेवा में नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि यदि आरोपी को संदेह का लाभ (benefit of doubt) देकर बरी किया गया है, तो नियोक्ता या स्क्रीनिंग कमेटी उसके आपराधिक रिकॉर्ड और आचरण को देखते हुए उसे सेवा के लिए अनुपयुक्त मान सकती है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मध्य प्रदेश में पुलिस कांस्टेबल (ड्राइवर) पद की भर्ती से जुड़ा था। वर्ष 2016 की भर्ती प्रक्रिया में राजकुमार यादव का चयन हुआ था।
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हालांकि नियुक्ति से पहले चरित्र सत्यापन (character verification) के दौरान यह सामने आया कि उनके खिलाफ वर्ष 2012 में एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था, जिसमें अपहरण, साजिश और बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। बाद में ट्रायल कोर्ट ने 26 सितंबर 2014 को उन्हें बरी कर दिया।
इसके बाद पुलिस विभाग की स्क्रीनिंग कमेटी ने मामले की जांच करते हुए यह निर्णय लिया कि ऐसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। इसलिए उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई।
राजकुमार यादव ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने पहले स्क्रीनिंग कमेटी के निर्णय को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी थी।
लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला “सम्मानजनक बरी” (honourable acquittal) माना जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि उम्मीदवार के मामले पर दोबारा विचार कर नियुक्ति का निर्णय लिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय से असहमति जताई और स्पष्ट किया कि संदेह का लाभ देकर दी गई बरी (benefit of doubt) को सम्मानजनक बरी नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा:
“यदि अदालत यह स्पष्ट रूप से कहे कि आरोपी ने अपराध नहीं किया, तभी उसे सम्मानजनक बरी कहा जा सकता है। लेकिन जब साक्ष्य कमजोर होने के कारण संदेह का लाभ दिया जाता है, तो यह तकनीकी आधार पर बरी होना माना जाता है।”
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अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस बल एक अनुशासित सेवा है और इसमें केवल निर्दोष चरित्र और उच्च नैतिकता वाले व्यक्तियों को ही शामिल किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा:
“पुलिस बल पर समाज का विश्वास टिका होता है। इसलिए उम्मीदवार का चरित्र, उसके पूर्व आचरण और आपराधिक पृष्ठभूमि भर्ती के समय महत्वपूर्ण कारक होते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार की उपयुक्तता तय करने का अधिकार मुख्य रूप से नियोक्ता और स्क्रीनिंग कमेटी के पास होता है।
अदालत ने कहा कि यदि स्क्रीनिंग कमेटी ने सभी तथ्यों को देखकर कोई निर्णय लिया है और उसमें मनमानी या दुर्भावना (mala fide) नहीं है, तो अदालतें सामान्यतः उसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने माना कि स्क्रीनिंग कमेटी ने उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि और मामले की प्रकृति को देखते हुए उसे पुलिस सेवा के लिए अनुपयुक्त मानने का जो निर्णय लिया था, वह उचित था।
इस प्रकार राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और स्क्रीनिंग कमेटी के फैसले को बरकरार रखा।
Case Title: The State of Madhya Pradesh & Ors. vs Rajkumar Yadav
Case No.: Civil Appeal No. 3279 of 2026 (Arising out of SLP (C) No. 10967 of 2024)
Decision Date: 11 March 2026










