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तलाक याचिका के बाद दर्ज दहेज केस में सास-ससुर को सुप्रीम कोर्ट से राहत, कहा-सिर्फ सामान्य आरोपों पर नहीं चल सकता मुकदमा

डॉ. सुशील कुमार पुर्बे एवं अन्य बनाम बिहार राज्य एवं अन्य। तलाक याचिका के बाद दर्ज दहेज केस में सुप्रीम कोर्ट ने सास-ससुर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की, कहा-सिर्फ सामान्य आरोपों पर मुकदमा नहीं चल सकता।

Vivek G.
तलाक याचिका के बाद दर्ज दहेज केस में सास-ससुर को सुप्रीम कोर्ट से राहत, कहा-सिर्फ सामान्य आरोपों पर नहीं चल सकता मुकदमा

दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सास-ससुर के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि एफआईआर में आरोप केवल सामान्य और अस्पष्ट हों तथा किसी आरोपी की स्पष्ट भूमिका न बताई गई हो, तो ऐसे मामलों में मुकदमा जारी रखना उचित नहीं है।

पीठ ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने समान परिस्थितियों में एक आरोपी को राहत दी थी, लेकिन सास-ससुर को वही राहत न देना न्यायसंगत नहीं था।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला की शादी 8 जुलाई 2019 को डॉ. ऋषि राज से हुई थी। कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गया और मार्च 2021 में पति ने परिवार न्यायालय, दरभंगा में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की याचिका दाखिल कर दी।

इसके लगभग एक साल बाद, 18 मार्च 2022 को महिला की शिकायत पर बिहार के दरभंगा जिले में एफआईआर दर्ज की गई। इसमें पति, सास-ससुर और ननद पर भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 323, 498A और 34 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए।

एफआईआर में आरोप था कि शादी के बाद महिला को लगातार प्रताड़ित किया गया और उससे बीएमडब्ल्यू कार सहित महंगे सामान की मांग की गई। शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपियों ने मिलकर उसका गला दबाने की कोशिश की।

हाईकोर्ट में क्या हुआ

सास-ससुर और ननद ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

हाईकोर्ट ने नवंबर 2022 में आंशिक राहत देते हुए ननद के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं।

हालांकि, हाईकोर्ट ने सास-ससुर के खिलाफ कार्यवाही जारी रहने दी और कहा कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए सास-ससुर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि एफआईआर में सास-ससुर के खिलाफ भी वही सामान्य आरोप हैं जो ननद के खिलाफ लगाए गए थे।

अदालत ने कहा कि एफआईआर में सास-ससुर की किसी विशेष भूमिका या अलग घटना का उल्लेख नहीं किया गया है।

पीठ ने कहा, “एफआईआर का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट है कि ननद और वर्तमान अपीलकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप मूल रूप से एक जैसे हैं। किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई विशिष्ट कृत्य या घटना का उल्लेख नहीं है।”

अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह आरोप कि सास-ससुर झगड़ा करते थे, अपने-आप में कोई आपराधिक अपराध साबित नहीं करता और इससे दहेज या मारपीट के आरोपों के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

देरी और परिस्थितियों पर अदालत का विचार

पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि शादी 2019 में हुई थी और पति ने मार्च 2021 में तलाक की याचिका दायर कर दी थी।

लेकिन आपराधिक शिकायत मार्च 2022 में दर्ज हुई, यानी तलाक की याचिका के लगभग एक साल बाद।

अदालत ने कहा कि अकेले देरी मुकदमा रद्द करने का आधार नहीं हो सकती, लेकिन जब आरोप भी अस्पष्ट हों, तो यह परिस्थिति इस आशंका को मजबूत करती है कि मामला तलाक की कार्यवाही के जवाब में दर्ज कराया गया हो सकता है।

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अदालत का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आरोपों की प्रकृति एक जैसी है, तो हाईकोर्ट द्वारा अलग-अलग मानदंड अपनाना उचित नहीं था।

पीठ ने अपने फैसले में कहा, “चूंकि ननद और अपीलकर्ताओं के खिलाफ आरोप समान हैं, इसलिए जिन कारणों से ननद के खिलाफ कार्यवाही रद्द की गई, वही कारण सास-ससुर के मामले में भी लागू होते हैं।”

अदालत ने पटना हाईकोर्ट के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें सास-ससुर को राहत देने से इनकार किया गया था।

इसके साथ ही दरभंगा में दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही सास-ससुर के खिलाफ समाप्त कर दी गई। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि पति के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर इस आदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और वह कानून के अनुसार जारी रहेगी।

Case Title: Dr. Sushil Kumar Purbey & Anr. vs The State of Bihar & Ors.

Case No.: Criminal Appeal (Arising out of SLP (Crl.) No. 3075/2024)

Decision Date: 09 March 2026

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