दिल्ली हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग कानून की व्याख्या करते हुए एक अहम फैसला दिया है, जिसमें यह सवाल केंद्र में था कि क्या PMLA लागू होने से पहले खरीदी गई संपत्ति को बाद में अटैच किया जा सकता है|
डिवीजन बेंच, जिसमें Justice C. Hari Shankar और Justice Om Prakash Shukla शामिल थे, ने Directorate of Enforcement (ED) की अपील पर सुनवाई की।
मामला National Agricultural Marketing Cooperative Federation से जुड़े कथित घोटाले से निकला, जिसमें अधिकारियों और निजी कंपनियों के बीच मिलीभगत के आरोप लगे।
Read Also:- इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए हर मामले में सुरक्षा बॉन्ड जरूरी नहीं
जांच के अनुसार, कथित रूप से गलत तरीके से प्राप्त धन कई कंपनियों के माध्यम से घुमाया गया और अंततः 2005 में दिल्ली के वसंत विहार में एक संपत्ति खरीदने में इस्तेमाल हुआ।
यह संपत्ति M/s Mahanivesh Oils & Foods Pvt Ltd के नाम पर खरीदी गई थी, जहां आरोपी की पत्नी डायरेक्टर थीं। इस मामले में Central Bureau of Investigation ने 2009 में FIR दर्ज की थी।
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि अगर कोई संपत्ति PMLA लागू होने से पहले “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” से खरीदी गई हो, तो क्या बाद में केवल उसके कब्जे के आधार पर उसे अटैच किया जा सकता है।
ED का तर्क था कि अगर कोई व्यक्ति आज भी ऐसी संपत्ति का उपयोग या कब्जा बनाए रखता है, तो यह मनी लॉन्ड्रिंग के दायरे में आएगा।
वहीं, कंपनी की ओर से कहा गया कि पूरा लेन-देन और संपत्ति खरीद PMLA लागू होने से पहले ही पूरी हो चुकी थी, इसलिए इस कानून को पीछे से लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने साफ किया कि PMLA को अलग-अलग नहीं बल्कि एक संपूर्ण व्यवस्था (Sections 3, 5 और 8) के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
बेंच ने यह भी कहा:
- “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” सिर्फ नकद रकम नहीं बल्कि उससे खरीदी गई संपत्ति भी होती है
- मनी लॉन्ड्रिंग में केवल पैसा कमाना ही नहीं, बल्कि उस संपत्ति का कब्जा और उपयोग भी शामिल हो सकता है
- यह मानना गलत है कि एक बार पैसा सिस्टम में आ गया तो अपराध खत्म हो गया
कोर्ट ने संकेत दिया कि लगातार कब्जा भी कानून के तहत महत्वपूर्ण कारक हो सकता है।
हाईकोर्ट ने सिंगल जज के फैसले में कई कानूनी त्रुटियां पाईं, खासकर यह मानने में कि मनी लॉन्ड्रिंग की प्रक्रिया PMLA लागू होने से पहले ही खत्म हो गई थी।
कोर्ट ने कहा कि:
- “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” की परिभाषा व्यापक है
- संपत्ति का निरंतर कब्जा और उपयोग भी मनी लॉन्ड्रिंग के दायरे में आ सकता है
इस प्रकार, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में PMLA के तहत कार्रवाई पूरी तरह से खारिज नहीं की जा सकती।
Case Details Section
Case Title: Directorate of Enforcement v. M/s Mahanivesh Oils & Foods Pvt Ltd
Case Number: LPA 144/2016
Court: Delhi High Court
Judge: Justice C. Hari Shankar, Justice Om Prakash Shukla
Date: 16 March 2026









