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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: MCGM की चुनौती खारिज, कहा-ट्रिब्यूनल की नियुक्ति वैध, आर्बिट्रेशन अवॉर्ड बरकरार

म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई बनाम मेसर्स आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स लिमिटेड, सुप्रीम कोर्ट ने MCGM बनाम R.V. Anderson मामले में फैसला देते हुए आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल की नियुक्ति को वैध माना और हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: MCGM की चुनौती खारिज, कहा-ट्रिब्यूनल की नियुक्ति वैध, आर्बिट्रेशन अवॉर्ड बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई महानगरपालिका (MCGM) और एक कनाडाई इंजीनियरिंग कंपनी के बीच लंबे समय से चल रहे आर्बिट्रेशन विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता (Arbitration) ट्रिब्यूनल की नियुक्ति को केवल तकनीकी आधार पर अवैध नहीं कहा जा सकता, खासकर तब जब पक्षकार खुद लंबे समय तक उस प्रक्रिया में भाग लेते रहे हों।

न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने MCGM द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई की सीवरेज सेवाओं को उन्नत करने से जुड़े एक कंसल्टेंसी प्रोजेक्ट से उत्पन्न हुआ था। यह परियोजना विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित थी और इसका ठेका कनाडा की इंजीनियरिंग कंपनी M/s R.V. Anderson Associates Ltd. को मिला था।

दोनों पक्षों के बीच 18 सितंबर 1995 को समझौता हुआ था, जिसके तहत कंपनी को सीवरेज सिस्टम के संचालन और रखरखाव को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी सलाह देनी थी।

परियोजना 2001 में पूरी हो गई, लेकिन भुगतान को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। कंपनी ने दावा किया कि उसके कई बकाया भुगतान लंबित हैं, जबकि MCGM ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया।

विवाद कैसे पहुँचा आर्बिट्रेशन तक

जब आपसी बातचीत से विवाद सुलझ नहीं पाया, तो कंपनी ने 2005 में अनुबंध में मौजूद आर्बिट्रेशन क्लॉज के तहत मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की।

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दोनों पक्षों ने अपने-अपने नामित मध्यस्थ नियुक्त किए और तीसरे यानी प्रेसीडिंग आर्बिट्रेटर की नियुक्ति का प्रयास किया। इस दौरान कई नियुक्तियां हुईं और कुछ मध्यस्थों ने इस्तीफा भी दे दिया।

आखिरकार ट्रिब्यूनल का गठन हुआ और उसने 5 जून 2010 को अंतिम आर्बिट्रेशन अवॉर्ड पारित किया।

इस अवॉर्ड में MCGM को कंपनी को USD 2,078,349.25 और कुछ भारतीय रुपये सहित ब्याज देने का निर्देश दिया गया।

MCGM की आपत्ति

MCGM ने अवॉर्ड को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका मुख्य तर्क था कि ट्रिब्यूनल का गठन अनुबंध के अनुसार नहीं हुआ।

नगरपालिका का कहना था कि अनुबंध की शर्त के अनुसार यदि दो मध्यस्थ 30 दिनों के भीतर तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर पाते, तो नियुक्ति ICSID (International Centre for Settlement of Investment Disputes) के सचिव-जनरल द्वारा की जानी चाहिए थी।

MCGM के मुताबिक चूंकि ऐसा नहीं हुआ, इसलिए पूरा ट्रिब्यूनल ही अधिकार क्षेत्र से बाहर था और उसका अवॉर्ड भी अमान्य है।

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अदालत की प्रमुख टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

पीठ ने कहा कि अनुबंध की धारा 8.3(b) को सही तरीके से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि ICSID के पास जाना केवल एक “सुविधा देने वाला विकल्प (enabling provision)” था, अनिवार्य शर्त नहीं।

अदालत ने कहा:

“यदि दोनों मध्यस्थ 30 दिनों में तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर पाते, तो पक्षकार ICSID से नियुक्ति की मांग कर सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मध्यस्थों की अपनी नियुक्ति की शक्ति समाप्त हो जाती है।”

पीठ ने यह भी कहा कि अगर इस क्लॉज को MCGM के तरीके से पढ़ा जाए तो विवाद निपटान की प्रक्रिया अनिश्चितकाल के लिए रुक सकती है, जो व्यावसायिक समझदारी के खिलाफ होगा।

पक्षकारों के आचरण पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि MCGM ने कई वर्षों तक ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में भाग लिया और कई नियुक्तियों पर कोई आपत्ति नहीं उठाई।

यहाँ तक कि तीन अलग-अलग व्यक्तियों को प्रेसीडिंग आर्बिट्रेटर नियुक्त किए जाने पर भी उसने तत्काल विरोध नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि:

“कोई पक्ष प्रक्रिया में भाग लेने के बाद, जब परिणाम उसके खिलाफ हो जाए, तब अचानक अधिकार क्षेत्र की आपत्ति नहीं उठा सकता।”

अदालत ने इसे आर्बिट्रेशन कानून के तहत पार्टी ऑटोनॉमी और न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप के सिद्धांतों के अनुरूप बताया।

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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल द्वारा अनुबंध की जो व्याख्या की गई थी, वह एक तर्कसंगत और संभावित (plausible) व्याख्या थी।

इसलिए न तो सेक्शन 34 के तहत अवॉर्ड को रद्द करने का आधार बनता है और न ही सेक्शन 37 की अपील में हस्तक्षेप की जरूरत है।

अदालत ने MCGM की सभी अपीलें खारिज कर दीं और कहा कि आर्बिट्रेशन अवॉर्ड बरकरार रहेगा।

Case Title: Municipal Corporation of Greater Mumbai vs M/s R.V. Anderson Associates Ltd.

Case No.: Civil Appeal (Arising out of SLP (C) Nos. 23846–23847 of 2025)

Decision Date: 11 March 2026

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