सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 2010 की उस व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो “अकादमिक अरेंजमेंट” के आधार पर नियुक्त कर्मचारियों को नियमितीकरण से बाहर रखती थी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि केवल नियुक्ति के नाम या श्रेणी के आधार पर कर्मचारियों को नियमितीकरण से वंचित करना संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है।
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मामले की पृष्ठभूमि
मामला उन कर्मचारियों से जुड़ा था जिन्हें 2011 से 2013 के बीच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जूनियर स्टाफ नर्स और फीमेल मल्टीपर्पस हेल्थ वर्कर के पदों पर “अकादमिक अरेंजमेंट” के आधार पर नियुक्त किया गया था।
इन नियुक्तियों का आधार जम्मू-कश्मीर मेडिकल एंड डेंटल एजुकेशन (अकादमिक अरेंजमेंट) नियम, 2009 था।
दूसरी ओर, राज्य ने 2010 में जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 2010 बनाया, जिसका उद्देश्य लंबे समय से कार्य कर रहे एड-हॉक या कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों का नियमितीकरण करना था।
लेकिन इस कानून की धारा 3(b) में “अकादमिक अरेंजमेंट” पर नियुक्त कर्मचारियों को इस लाभ से बाहर कर दिया गया था।
इसी प्रावधान को चुनौती देते हुए कर्मचारियों ने पहले हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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हाई कोर्ट का फैसला
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
हाई कोर्ट ने कहा था कि 2010 का कानून केवल उन नियुक्तियों पर लागू होता है जो तय तिथि से पहले हुई हों। साथ ही यह भी कहा गया कि अकादमिक अरेंजमेंट के तहत नियुक्त कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति का कोई विशेष अधिकार नहीं है।
इस फैसले को कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य ने कर्मचारियों के बीच जो वर्गीकरण किया है, वह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
पीठ ने कहा:
“जहां कर्मचारी समान प्रकृति के कार्य, सेवा शर्तें और नियुक्ति प्रक्रिया के तहत काम कर रहे हों, वहां केवल नाम या श्रेणी के आधार पर उन्हें अलग व्यवहार देना स्वीकार्य नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य को एक आदर्श नियोक्ता (model employer) की तरह व्यवहार करना चाहिए और कर्मचारियों को कृत्रिम वर्गीकरण के जरिए अधिकारों से वंचित नहीं करना चाहिए।
पीठ ने यह भी पाया कि “अकादमिक अरेंजमेंट” और “कॉन्ट्रैक्ट” नियुक्तियों के नियमों में कई मामलों में समानता थी, इसलिए अलग श्रेणी बनाना तर्कसंगत नहीं था।
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कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2010 का कानून वास्तव में लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों को सुरक्षा देने और अनियमित नियुक्तियों को नियमित करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
लेकिन “अकादमिक अरेंजमेंट” कर्मचारियों को इस लाभ से बाहर करना उसी उद्देश्य के विपरीत है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी कानून में तय शर्तें पूरी करता है, तो उसके शुरुआती नियुक्ति के नाम या तरीके का महत्व नहीं रह जाता।
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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के 22 फरवरी 2023 और 27 दिसंबर 2024 के फैसलों को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने यह भी घोषित किया कि जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 2010 की धारा 3(b) असंवैधानिक है, क्योंकि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह अपीलकर्ताओं के मामलों पर चार सप्ताह के भीतर नियमितीकरण के लिए विचार करे और यह लाभ उन सभी कर्मचारियों को भी मिलेगा जो समान स्थिति में हैं और कानून की शर्तें पूरी करते हैं।
Case Title: Abhishek Sharma vs State of Jammu & Kashmir & Others
Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 5108 of 2023 & connected matters
Decision Date: 09 March 2026










